
विद्वानों का मानना है कि मानव हृदय अनंत रूपात्मक जगत के नाना रूपों और व्यापारों में भटकता रहता है लेकिन जब मनुष्य अहं की भावना का परित्याग करता है तो वहाँ विशुद्ध अनुभूति रह जाती है। तब वह मुक्त हृदय रह जाता है ।हृदय की इस मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। कहा गया है – कवि परिभूः स्वयंभू – कविता में सत्य शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। अनुभूति और अभिव्यक्ति इन दो आधार पर कविता टिकी होती है।
‘प्रयाण ‘केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि एक यात्रा है—संवेदना से समाज तक, शब्दों से मौन तक, और अनुभव से आत्मा तक। यह संग्रह उन भावनाओं को स्वर देता है, जो अक्सर हमारी भाषा में नहीं आ पातीं, लेकिन भीतर कहीं गहराई से हमें छूती हैं।
इस संग्रह की कविताएं निजी भी हैं और सामाजिक भी। कवयित्री इन दोनों के बीच की उस महीन रेखा पर खड़ी हैं, जहाँ एक स्त्री, एक मानव और एक संवेदनशील आत्मा अपने समय, समाज और अपने अंतर्मन से संवाद करती है। कुछ कविताएं सामाजिक विडंबनाओं पर टिप्पणी करती हैं, वहीं कुछ कविताएं पाठक के भीतर गूंज बनकर उतरती हैं—बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं।
यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए अनमोल है जो कविता को केवल पंक्तियों में नहीं, भावनाओं और परिवर्तन की प्रक्रिया में महसूस करना चाहते हैं। एक ऐसा साहित्यिक प्रयास है जो वर्तमान समय में सामाजिक यथार्थ और स्त्री-मन की जटिलताओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। यह संग्रह आधुनिक हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो एक शिक्षिका अपने बच्चों को सीख देते हुए उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाने के सपने देखती है।
विषयवस्तु की दृष्टि से देखा जाए तो वहां विविधता है—ध्यान योग, आत्म विश्वास, संकल्प, आत्मनिर्भरता की आकांक्षा, स्त्री अस्मिता की खोज, और सामाजिक चुप्पियों के विरुद्ध एक सशक्त स्वर। लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रत्येक कविता में पाठक को संवेदना से जोड़ने में सफल होती हैं। कहीं शब्दों के माध्यम से तो कहीं मौन के माध्यम से कविताएं में भाषा सौष्ठव, शिल्प कला और संवादात्मक प्रभाव है। यह शैली इस बात का प्रमाण है कि लेखक संवेदना को सहजता से बरतने में विश्वास रखती हैं, दिखावे से नहीं।उनकी कविताओं में दो आसमां(Pg-19) कविता समाज में व्याप्त असमानता को दर्शाती है , मनभावन सावन (पृष्ठ 42) में प्रकृति चित्रण और शिक्षक जीवन (पृष्ठ 52) में एक शिक्षिका होने के कारण शिक्षक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण लक्षित है, रंगमंच (पृष्ठ 89) में आध्यात्मिक स्वर आदि कविताएं पठनीय और प्रेरणादायक हैं ।’मनभावन सावन’ में कवयित्री के भावों को समझा जा सकता है जहांँ शब्दों की झनकार और प्रकृति का उल्लास उमड़ रहा है। वे कहती हैं – –
‘आया मनभावन सावन हर्षित धरती अंबर
तज जीर्ण पुरातन वसन नव नूतन परिधान किया धारण
सुंदर मनमोहक आनन खिला-खिला है नव यौवन
औढ़ धानी चूनर धरा करती श्रृंगार स्निग्ध मनोरम।
हाथों पर हरित हिना पुलकित गात हर्षे हिया
शोभित सकल कानन उपवन चहुदिश फैली हरीतिमा
झूमे श्यामल घनघोर घटा उतरे रिमझिम बैरन बदरा
होगा प्रिय से पुनर्मिलन दर्शन को तरसे अखियां। ‘
हमें ऐसे साहित्य को न केवल पढ़ना चाहिए, बल्कि उसका समर्थन भी करना चाहिए, ताकि संवेदना और सामाजिक चेतना की यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
कविता कोठारी द्वारा रचित ‘प्रयाण ‘काव्य संग्रह लिंक जॉन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित स्वरचित कविताओं का संग्रह है। 2025 में आए इस कविता संग्रह में कवयित्री कविता कोठारी का शब्दों का वह अंत: सफर है जिसमें उनके अविस्मरणीय अनुभव, एहसास और उनकी व्यक्तिगत सोच है ।उनकी चिंतन धारा में पिरोई शब्दों की मणिमला है जिसकी एक एक कविता रत्न जटित मणियाँ हैं ।
प्रयाण की 80 कविताओं में विविध रंगों के भाव और अनुभव हैं । सभी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है मानो बहुत दिनों बाद एक परिष्कृत हिंदी भाषा की कविताओं को पढ़ने का शुभ अवसर मिला।
आध्यात्मिक भाव और साथ में समसामयिक विषयों पर अपने शब्दों को भाव देते हुए कवयित्री बहुत ही सजग और चेतनता से परिपूर्ण है।
इन कविताओं की यात्रा का उद्देश्य है ‘व्यष्टि से समष्टि’ की ओर जाने का, सच्चिदानंद को प्राप्त करना। हमारा देश महावीर ,बुद्ध ,विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि महापुरुषों का का देश रहा है जहाँ विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का मंथन होता आया है और
सात्विक अतः चेतना ,आध्यात्मिकता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को महत्व दिया गया है ।इस सात्विक राह में मनुष्य शरीर भी अपनी शक्तियों को केंद्रित कर आत्मोद्धार करने में सक्षम हो सकता है, रचनाओं की ऐसी विशिष्टता दिखाई पड़ती है।
गीता में भी कहा गया है ‘आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरा- त्मन:’ (गीता अध्याय 6 ,श्लोक 5 ) अर्थात् मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु, जो व्यक्ति अंतरात्मा में ही सुख वाला होगा, आत्मा में ही रमन करने वाला होगा और जो आत्मा में ही ज्ञान वाला होता है, वह सच्चिदानंद परमात्मा के साथ एकाकी भाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त करता है ।(गीता अध्याय 5 , श्लोक 24 )
‘प्रयाण’ की कविताएं एक ऐसी उर्ध्वमुखी जीवन की कला से जुड़ी हुई है जो एक श्रेष्ठ और सुसंस्कृत नागरिक की रचना करने का संदेश देती है। बुद्ध ने कहा था ‘अप्प दीपो भव’ अपने दीपक स्वयं बनो ,अपने प्रकाश स्वयं बनो। व्यक्ति अपने ज्ञान और आंतरिक शक्ति से प्रकाशित हो सकता है ।
दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं ही अपना मार्गदर्शक और प्रकाश स्तंभ बन सकता है। आत्मनिर्भरता और आत्मज्ञान से परिपूर्ण कविताएं हैं जिन्हें पढ़कर पाठक अपने भीतर छिपी हुई क्षमता को उभार सकता है।
‘आओ बात करें’ कविता में कवयित्री कहती है-‘ एकांत और मौन से खोज लाएं ‘ मन की खुशी को ढूंढा जा सकता है।
कविता कोठारी एक मनोचिकित्सक भी हैं जो समाज के लोग जो मानसिक तनाव,चिंता आदि के शिकार हो रहे हैं ऐसे लोगों की कौंसिलिंग भी करती हैं।
वर्तमान में बच्चे, युवा, बूढ़े और महिलाओं की मानसिक स्थितियों में परिवर्तन आया है जिससे एकाकीपन,अवसाद और तनाव भरी जिंदगी से जुड़ी समस्या का हल भी बताती हैं।यह हल व्यक्ति के भीतर ही छिपा है।
बतौर शिक्षिका कविता कोठारी का आदेश इन कविताओं में कहीं न कहीं दिखाई पड़ ही जाता है।
‘मुक्ति का आह्वान'( पृष्ठ 40 )में–
‘स्व के दायरे से निकल
दे आहुति परमार्थ यज्ञ’ (पृष्ठ 40)।
‘सतयुग लौटा लाना है अब'( पृष्ठ 40)
कवयित्री ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, विश्वास घात, षड्यंत्र के बढ़ते प्रकोप से दुखित है। छल- कपट की इस राह पर चलकर मनुष्य अपनी कब्र खुद खोद रहा है और रसातल में जा रहा है( पृष्ठ 39)।
‘प्रयाण ‘का अर्थ ही है यात्रा शुरू करना ,आगे बढ़ना और यह आगे बढ़ाने की गति का प्रतीक है। उत्कृष्ट बुद्धि ,चमक और तरक्की का प्रतीक है ।ऐसा प्रयत्न जो सकारात्मक प्रगति के लिए इस्तेमाल होता है ।हिंदू दर्शन में आत्मा की यात्रा या उसके अंत को भी प्रयाण कहा जाता है लेकिन कवयित्री आशावादी है और सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयाण का उपयोग किया गया है।
व्यक्तियों के अंतःकरण में जो समाज चेतना है उसी चेतना के धरातल पर ही विभिन्न अनुभूतियांं व्यक्ति के अंतःकरण का धर्म होकर समाज का धर्म बन जाती है।
कवयित्री की कविता का आरंभ ही हुआ है ‘सुसंस्कार’ शीर्षक से जो उनके भावों की यात्रा को सुनिश्चित कर देती है ।उनका कहना है कि –
अनुशासित ,संयमित जीवन,
सफलता का है अचूक मंत्र …
करुणा और विनम्रता से होगा
उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण (पृष्ठ 11 -12)
कवयित्री कविता कोठारी एक सजग और चेतनता से पूर्ण शिक्षिका रही हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप उनकी कविताएं अपना आकार लेती हैं। आपकी कविताओं को नैतिक ,सामाजिक और आध्यात्मिक एवं भाषा शिल्प सौष्ठव की दृष्टि से देखा जा सकता है।
सुंदरता को रेखांकित करते हुए बहुत ही अच्छा संदेश देती हैं– सुंदरता की परिभाषा में—
बाह्य सौंदर्य होता भ्रामक ..
वास्तविक सौंदर्य है प्राण तत्व
सत्य शिव और सुंदर जीवन धारा
उम्र छलावा (पृष्ठ 13 )
‘न खोओ परमार्थ में ‘अहंकार, आलस्य, विषय विलास, परनिंदा आदि कलुषित विचारों से दूर एक आत्मा शुद्ध व्यक्ति की मांग करती हैं।
अंतर चक्षु, अंतर सफर, यादों से मुलाकात, परमार्थ आदि कविताएं ध्यान और अपने व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक कविताएं हैं।
कविता ‘आओ बात करें’ (पृष्ठ60 ) में उनकी यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है — जहां कवियत्री ‘सकारात्मक ऊर्जा ,आत्म शक्ति से भर लें’ कह कर मानो अपनी सभी कविताओं का सार कह देती है। ‘ध्यान योग’ पर जोर देखकर अपने ही अंदर के आनंद को खोजने की बात करती है।
उनकी कविताओं में मुक्ताकाश, गर्भ संस्कार ,मुझसे ही मेरा जन्म हुआ, जीवन का आधार विश्वास ,चलो लौट चलें, विकृत दर्पण और संबंध नहीं ,स्वधर्म है मां आदि कविताएं भावों को व्यक्त करने वाली और पठनीय कविताएँ भी हैं।
भाषा में छायावादी पुट और विशुद्ध हिंदी की रचनात्मक झलकियाँ दिखाई पड़ती हैं । जीवन जीने की कला सिखाती इन कविताओं में जैन धर्म, बौद्ध धर्म और भगवद्गीता की बहुत सी बातें परिलक्षित होती हैं।





