कोलकाता की सुप्रसिद्ध हिंदी-उर्दू नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन ने 22 जुलाई 2026 की शाम ज्ञान मंच में अपने नवीनतम नाटक ‘चेहरे’ का मंचन किया। टोनी डेवनेई मोरिनेली के नाटक द सीन्स ऑफ द मदर पर आधारित तथा एस. एम. अज़हर आलम द्वारा रूपांतरित यह एक-अंकीय मनोवैज्ञानिक नाटक हमारे समय की एक असहज किंतु अत्यंत प्रासंगिक सच्चाई को मंच पर साकार करता है।
‘चेहरे’ परिवार की आदर्श और चमकदार छवि को प्रश्नांकित करता है। यह एक ऐसे घर की चारदीवारी में कैद तीन पीढ़ियों की स्त्रियों की कथा है, जहाँ प्रेम के साथ-साथ आघात भी विरासत में मिलता है। आरंभ में यह अमीना नामक एक शराबी माँ की कहानी प्रतीत होती है, किंतु धीरे-धीरे एक गहरे प्रश्न में बदल जाती है—क्या हम अनजाने में उन्हीं लोगों जैसे बन जाते हैं जिन्होंने कभी हमें तोड़ा था?
अमीना इस कथा में एक साथ पीड़िता भी है और उत्पीड़क भी। अम्मा की कठोरता ने उसके भीतर क्रूरता को जन्म दिया और वही क्रूरता अब उसकी बेटियों इशरत और रज़िया के जीवन को आकार देती है। नसीमा की स्मृतियों के माध्यम से नाटक यह स्थापित करता है कि हिंसा किसी एक व्यक्ति से शुरू नहीं होती; वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत की तरह हस्तांतरित होती रहती है। रूपांतरणकार एस. एम. अज़हर आलम ने मूल कथानक को अनावश्यक विस्तार से बचाते हुए उसे सघन, आत्मीय और प्रभावी बनाए रखा है।
इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी शक्ति इसका अभिनय है। अमीना की भूमिका में चंद्रेयी मित्रा ने घृणा और करुणा के द्वंद्व को इतनी सहजता से साकार किया कि दर्शक उससे वितृष्णा के साथ-साथ उसके भीतर छिपे टूटे हुए मनुष्य को भी देख पाता है। इशरत के रूप में एनी दास दबी हुई ज़िम्मेदारी और आत्म-भ्रम का प्रभावशाली रूप प्रस्तुत करती हैं, जबकि गुंजन अज़हर की रज़िया दमित आक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति बनकर उभरती हैं। दोनों बहनों के बीच प्रेम और वैमनस्य का तनाव पूरे नाटक में विश्वसनीय बना रहता है। नसीमा की भूमिका में नूपुर भौतिका स्मृतियों को आवश्यक संदर्भ देती हैं और किसी भी पात्र का पक्ष लिए बिना कथा की संवेदनात्मक परतों को उभारती हैं। वहीं संगीता व्यास की अम्मा मंच पर अल्प समय के लिए उपस्थित होकर भी पूरे नाटक पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं।
निर्देशिका उमा झुनझुनवाला की दृष्टि संयमित, प्रतीकात्मक और अभिनेता-केंद्रित है। उन्होंने मंच को अनावश्यक सजावट से मुक्त रखते हुए एक गलियारे और कैनवास चित्रों के माध्यम से “अतीत में फँसे होने” की अनुभूति निर्मित की है। प्रकाश, रंग और मंचीय स्थान का उनका प्रयोग उन भावों को व्यक्त करता है जिन्हें संवाद पूरी तरह नहीं कह पाते। यहाँ आघात केवल पात्रों की स्मृतियों में नहीं, बल्कि दीवारों, चेहरों और यहाँ तक कि वेशभूषा के रंगों में भी उपस्थित महसूस होता है। यह ऐसा सूक्ष्म निर्देशन है जहाँ किसी एक प्रॉप या प्रकाश-संकेत के हट जाने से भी अर्थ बदल सकता है।
उमा झुनझुनवाला द्वारा परिकल्पित मंच-सज्जा स्वयं एक पात्र का रूप धारण कर लेती है। गलियारे में टंगे चेहरे, मुखौटे और खंडित भावों वाले चित्र केवल दृश्य सज्जा नहीं हैं; वे नाटक के शीर्षक ‘चेहरे’ का दृश्यात्मक विस्तार हैं। ये अम्मा के चेहरे हैं, अतीत के चेहरे हैं और उन भूमिकाओं के चेहरे हैं जिन्हें स्त्रियाँ अनचाहे भी जीवन भर ढोने को विवश रहती हैं।
जॉयदीप रॉय की प्रकाश-योजना और मुरारी रायचौधरी की संगीत-परिकल्पना वर्तमान और स्मृति के बीच सहज संक्रमण रचती है तथा प्रस्तुति के भावलोक को और अधिक सघन बनाती है।
‘चेहरे’ सहज या मनोरंजनप्रधान नाटक नहीं है। यह दर्शक को इसलिए असहज करता है क्योंकि वह उसे एक कठिन सत्य के सामने खड़ा करता है। नाटक उपचार का कोई सरल समाधान नहीं देता, किंतु यह संकेत अवश्य करता है कि किसी घाव को पहचानना और उसका नाम लेना ही उससे मुक्ति की पहली सीढ़ी हो सकता है।
लिटिल थेस्पियन ने इस प्रस्तुति के माध्यम से साहसिक, संवेदनशील और आवश्यक रंगकर्म का परिचय दिया है। यहाँ करुणा भी है और सत्य भी। नाटक की समाप्ति के बाद सभागार में पसरा सन्नाटा इस बात का प्रमाण था कि ‘चेहरे’ ने दर्शकों को केवल विचलित नहीं किया, बल्कि उनके भीतर गहरे तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।




