-उदय कुमार सिंह
सनातन संस्कृति में महाशिवरात्रि का अत्यंत विशिष्ट और गूढ़ महत्व है। हिंदू धर्म में फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव की आराधना, तपस्या और साधना का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। महाशिवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि यह आत्मिक शुद्धि, आध्यात्मिक जागरण और शिव-शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक भी है। इस पावन अवसर पर देश-विदेश के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से संपूर्ण वातावरण शिवमय हो जाता है। भक्त व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
शिव और शक्ति ब्रह्मांड के मूल सत्य का प्रतीक वास्तव में शिव और शक्ति का संबंध केवल देव–देवी का नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के मूल सत्य का प्रतीक है। शिव शुद्ध चेतना हैं, वह मौन हैं, स्थिर हैं, असीम हैं। शक्ति उस चेतना की सक्रिय ऊर्जा हैं, जो सृष्टि को गति देती है, आकार देती है और परिवर्तन का कारण बनती है। शिव बिना शक्ति के शव के समान माने गए हैं और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन ऊर्जा। इसी कारण कहा गया है कि शिव और शक्ति अलग नहीं, एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं।
शिव को पुरुष तत्व कहा गया है, जो साक्षी भाव में स्थित रहते हैं। वह न सृजन करते हैं, न संहार की इच्छा रखते हैं, केवल सबकुछ होते हुए देखते हैं। वहीं शक्ति स्त्री तत्व हैं, जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शक्ति ही ब्रह्मा से सृष्टि कराती हैं, विष्णु से पालन कराती हैं और रुद्र से संहार कराती हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप शिव–शक्ति की अद्भुत एकता का सबसे गहरा प्रतीक है। इस रूप में आधा शरीर शिव का और आधा शक्ति का होता है, जो यह दर्शाता है कि पुरुष और स्त्री, स्थिरता और गति, ज्ञान और क्रिया सब एक ही सत्य के अभिन्न भाग हैं। यह रूप यह भी सिखाता है कि संतुलन के बिना सृष्टि संभव नहीं।
तंत्र शास्त्र में शक्ति को कुंडलिनी के रूप में माना गया है, जो मानव शरीर में मूलाधार में सुप्त अवस्था में रहती हैं। जब साधना द्वारा यह शक्ति जाग्रत होकर सहस्रार तक पहुंचती है, तब वह शिव से मिलन करती है। यही मिलन आत्मज्ञान, समाधि और मोक्ष का द्वार खोलता है। इसीलिए कहा गया है कि साधना में शक्ति का जागरण और शिव में लय होना ही अंतिम लक्ष्य है। शिव विनाश के देवता नहीं बल्कि परिवर्तन के अधिपति हैं और शक्ति केवल माया नहीं बल्कि चेतना को व्यक्त करने वाली दिव्य शक्ति हैं। जब जीवन में स्थिरता आती है तो शिव का तत्व कार्य करता है और जब परिवर्तन आता है तो शक्ति सक्रिय होती हैं। हर श्वास में शक्ति है और हर शांति में शिव।
शिव और शक्ति का रहस्य यह सिखाता है कि संसार में जो भी द्वैत दिखाई देता है, वह वास्तव में एक ही सत्य का विस्तार है। जब साधक इस सत्य को अनुभव कर लेता है, तब बाहर शिव की खोज समाप्त हो जाती है और भीतर शक्ति जाग्रत होकर स्वयं शिव का साक्षात्कार करा देती।
शिव-शक्ति के मिलन की रात्रि – धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि वह पावन रात्रि है जब देवों के देव महादेव और जगत जननी माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसी कारण इस पर्व को शिव और शक्ति के मिलन की रात्रि कहा जाता है। शिव को पुरुष तत्व और शक्ति को प्रकृति का स्वरूप माना गया है। इन दोनों का मिलन ही सृष्टि के सृजन, संतुलन और संचालन का आधार है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा, नियम और संयम के साथ शिवपूजन, जप, तप और व्रत करता है, उस पर भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की विशेष कृपा बरसती है। ऐसे भक्तों के जीवन से रोग, शोक, दरिद्रता और मानसिक कष्ट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि का वास होता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से महाशिवरात्रि का महत्व – महाशिवरात्रि का महत्व केवल पौराणिक या धार्मिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी है। योग और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, यह वह रात्रि होती है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने उच्चतम स्तर पर होती है। इस रात्रि में की गई साधना, ध्यान और मंत्र जाप साधक को विशेष आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करता है। इसी कारण महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष विधान बताया गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस रात्रि में जागरण कर भगवान शिव का ध्यान करने से आत्मा का शुद्धिकरण होता है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि – अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ही महाशिवरात्रि क्यों कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वर्ष के प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि आती है, जिसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि को सभी शिवरात्रियों में श्रेष्ठ माना गया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इसी तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसके अतिरिक्त यह भी मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान शिव ने शिवलिंग स्वरूप में स्वयं को प्रकट किया था। इन्हीं कारणों से इसे साधारण शिवरात्रि न कहकर महाशिवरात्रि कहा गया।
रात्रिकालीन विवाह और निशीथ काल का महत्व – हिंदू धर्म में रात्रिकालीन विवाह मुहूर्त को अत्यंत शुभ माना गया है। भगवान शिव का विवाह भी देवी पार्वती से रात्रि के समय ही हुआ था। जिस दिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि मध्यरात्रि यानी निशीथ काल में होती है, उसी दिन महाशिवरात्रि मनाने की परंपरा है। निशीथ काल को शिव साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। इस काल में की गई पूजा, जप और अभिषेक से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है और साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
महाशिवरात्रि 2026: तिथि और पंचांग विवरण – पंचांग के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 15 फरवरी 2026 को सायं 05:04 बजे होगा, जबकि इस तिथि का समापन 16 फरवरी 2026 को प्रातः 05:34 बजे होगा। इस प्रकार वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व रविवार, 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा।
संक्षिप्त विवरण
• महाशिवरात्रि की तिथि: 15 फरवरी 2026, रविवार
• निशीथ काल पूजा समय: 15 फरवरी 2026 की रात 11:52 बजे से 16 फरवरी 2026 को 12:42 बजे तक। इस दौरान शिवभक्तों को भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए लगभग 50 मिनट का समय प्राप्त होगा।
चार प्रहर पूजा का विशेष विधान – महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर भगवान शिव की पूजा करने का विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है। प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग पदार्थों से अभिषेक और मंत्र जाप करने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
प्रथम प्रहर की पूजा
समय: सायंकाल 06:01 से रात्रि 09:09 बजे तक
अभिषेक: दूध से
मंत्र: ॐ ह्रीं ईशानाय नमः
द्वितीय प्रहर पूजा
समय: रात्रि 09:09 से 16 फरवरी 2026 को 12:17 बजे तक
अभिषेक: दही से
मंत्र: ॐ ह्रीं अघोराय नमः
तृतीय प्रहर पूजा
समय: 16 फरवरी 2026 को 12:17 से 03:25 बजे तक
अभिषेक: घी से
मंत्र: ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः
चतुर्थ प्रहर पूजा
समय: 03:25 से प्रातः 06:33 बजे तक
अभिषेक: शहद से
मंत्र: ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः
चारों प्रहरों में विधिपूर्वक की गई पूजा से शिव कृपा प्राप्त होती है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
पौराणिक कथा: कुबेर और महाशिवरात्रि – पुराणों में महाशिवरात्रि से जुड़ी अनेक कथाएं वर्णित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, पूर्वजन्म में कुबेर ने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की उपासना कर ली थी। इस पुण्य के प्रभाव से उन्हें अगले जन्म में शिवभक्ति की विशेष कृपा प्राप्त हुई और वे देवताओं के कोषाध्यक्ष बने। यह कथा महाशिवरात्रि पर की गई पूजा के अद्भुत प्रभाव को दर्शाती है।
शिवयोग और सिद्ध योग का महत्व –महाशिवरात्रि का शुभारंभ शिवयोग में होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिवयोग को शिव आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस योग में गुरुमंत्र, पूजन संकल्प और साधना विशेष फल प्रदान करती है। इसके पश्चात सिद्ध योग आरंभ होता है, जो मंत्र साधना, जप और ध्यान के लिए श्रेष्ठ माना गया है। सिद्ध योग में मध्यरात्रि के समय शिव मंत्रों का जाप विशेष फलदायी होता है।
गृहस्थों के लिए साधना संबंधी सुझाव – महाशिवरात्रि पर गृहस्थ श्रद्धालु भी सरल विधि से भगवान शिव और माता शक्ति की साधना कर सकते हैं। रात्रि के समय रुद्राभिषेक, मंत्र जप और ध्यान विशेष फल प्रदान करते हैं। सामान्य गृहस्थों के लिए प्रातःकाल और संध्या समय शिव-शक्ति की आराधना करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। दोपहर बाद चतुर्दशी तिथि लगने पर शिव पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। वास्तव में महाशिवरात्रि सनातन संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जो भक्तों को आत्मिक शुद्धि, साधना और ईश्वर से जुड़ने का अनुपम अवसर प्रदान करता है। इस पावन रात्रि में श्रद्धा और विधि-विधान से की गई शिव आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
(साभार – हिन्दुस्तान समाचार)




