जब एक भारतीय महिला वैज्ञानिक ने ढूंढ़ निकाला कैंसर का इलाज

देश और दुनिया के मशहूर और होनहार वैज्ञानिकों में आपने कई भारतीय वैज्ञानिकों के नाम सुने होंगे। जहां एक ओर आर्यभट्ट ने जीरो की खोज कर गणित को आसान बनाया, तो वहीं दूसरी ओर इतिहास में कुछ ऐसी भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने नाम दर्ज कराया, जिनकी खोज ने दुनिया के सामने खतरनाक बीमारियों के इलाज का एक नया विकल्प दिया। इनमें एक थीं असीमा चटर्जी। वह पहली भारतीय महिला है जिन्हें किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि मिली। भारत के राष्ट्रपति द्वारा असीमा चटर्जी को राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुना गया। असीमा चटर्जी का जन्‍म 23 सितंबर को साल 1917 में कोलकाता में हुआ था। तब लड़कियों का हाई स्‍कूल से आगे पढ़ना असामान्‍य बात थी। उनके पिता डॉ. इंद्रनारायण मुखर्जी और मां कमला देवी ने हालांकि कभी इस बात पर रोक टोक नहीं लगाई, पर संयुक्त परिवार  में होने के कारण असीमा को कुछ बड़े बुजुर्गो के विरोध का सामना करना पड़ा। असीमा अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं, इसलिए उन पर इस बात का दबाव ज्‍यादा था कि उनसे उनके भाई बहन क्‍या सीखेंगे।

असीमा ने साल 1932 में कोलकाता के बेथुन कॉलेजिएट से 10वीं पास किया और साल 1934 में आईएससी परीक्षा भी पास कर ली। आसीमा को आईएससी में बंगाल सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिली थी।

असीमा इसके बाद अब कॉलेज की पढ़ाई करना चाहती थीं। लेकिन कोएड कॉलेजमें दाखिला लेना उनके लिए इतना आसान भी नहीं था। अपने ही परिवार के विरोध का सामना करने के बाद बावजूद अपनी मां की मदद से उन्‍होंने स्‍कॉटिश चर्च कॉलेज में एडमिशन ले ही लिया। असीमा ने केमेस्ट्री विभाग में दाखिला लिया था और विभाग में असीमा अकेली लड़की थीं।

असीमा चटर्जी पढ़ने में जितनी होशियार थीं उतनी ही बेहतरीन संगीत में भी थीं। कंठ संगीत में उनकी दिलचस्‍पी ज्‍यादा थी। उन्‍होंने शास्त्रीय संगीत सीखा। करीब 14 साल तक ध्रुपद और खयाल सीखा और साल 1933 में हुए ऑल बंगाल म्‍यूजिक कॉम्‍पटिशन में दूसरा स्‍थान हासिल किया। असीमा की संस्कृत भाषा पर बहुत अच्‍छी पकड़ थी। यही वजह थी कि वो पुराने लेखकों के एतिहासिक लेखों को पढ़ती थीं। उनके पिता कई बार उनके इस हुनर की तारीफ भी करते थे।

11 महीने की बेटी को लेकर पहुंचीं अमेरिका

साल 1940 में असीमा ने लेडी ब्रेबॉर्न कॉलेज के की संस्थापक केमेस्ट्री विभागाध्यक्ष के तौर पर पढ़ाना शुरू किया। साल 1944 में उन्‍हें कलकत्ता विश्वविद्यालय की मानद प्रवक्ता के तौर पर नियुक्‍त कर लिया गया लेकिन असीमा केमिस्‍ट्री के क्षेत्र में और शोध करना चाहती थीं इसलिए उन्‍होंने साल 1947 में अमेरिका जाने का निर्णय लिया। वो अपनी 11 महीने की बेटी और एक आया को साथ लेकर अमेरिका पहुंच गईं।

यहीं उनकी मुलाकात अमेरिका स्‍थ‍ित रामकृष्‍ण-विवेकानंद केन्द्र में स्‍वामी निखिलानंद जी महाराज और स्‍वामी प्रभाबननंदजी महाराज से हुई। इसके बाद तो जैसे असीमा को अपना रास्‍ता मिल गया हो। असीमा को इन सभी आगे बढ़ने का प्रोत्‍साहन मिला। असीमा चटर्जी ने इसके बाद कई दवाएं विकसित कीं। इसमें कैंसर, मिर्गी  और मलेरिया विरोधी दवाओं का विकास सबसे महत्‍वपूर्ण है।

असीमा के शादी डॉ. बरदानंद चटर्जी से हुई। बरदानंद खुद प्रख्यात चिकित्सक थे। प्रोफेसर चटर्जी का अपनी पत्‍नी असीमा पर गहरा प्रभाव था। असीमा अगर खुद को विज्ञान को समर्पित कर पाईं तो इसमें प्रोफेसर चटर्जी  के प्रोत्‍साहन और सहयोग का भी योगदान था।

 

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