आज जब भारत तकनीक, विज्ञान और वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है, उसी समय हमारे समाज के भीतर एक ऐसा मौन घाव भी है, जो दिखता नहीं—पर पीड़ा देता है। यह घाव है अपने ही देश के उत्तर–पूर्वी राज्यों (सेवेन सिस्टर्स) को “अलग” समझने का।
उनकी आँखों की आकृति, उनकी त्वचा का वर्ण,उनकी वेशभूषा,उनकी बोली— इन सबको आधार बनाकर जब कोई उन्हें “पराया” कह देता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता—भारत की आत्मा सिसकती है।
भारतवर्ष: केवल देश नहीं, संस्कार की भूमि
संस्कृत में “भारत” शब्द का अर्थ है—
“भा” धातु = प्रकाश, ज्ञान
“रत” = जो उसमें रत हो
भारत अर्थात—जो ज्ञान और धर्म के प्रकाश में रत हो। यह परिभाषा किसी नक्शे से नहीं,
चेतना से जुड़ी है।इस भारतवर्ष में उत्तर–पूर्व, उत्तर–पश्चिम, दक्षिण, मध्य—ये दिशाएँ थीं, विभाजन नहीं। वैदिक दृष्टि: एकत्व का घोष
ऋग्वेद उद्घोष करता है—
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
(ऋग्वेद 10.191.2)
व्याख्या:
– साथ चलो
– साथ बोलो
– और तुम्हारे मन एक हों यह मंत्र किसी सभा के लिए नहीं था, यह समूचे भारतवर्ष के लिए जीवन-सूत्र था।
उत्तर–पूर्व और वैदिक परंपरा का संबंध
कामरूप और शक्ति-साधना
असम का कामरूप केवल एक क्षेत्र नहीं था—
वह शक्ति की आराधना का केन्द्र था।
कामाख्या पीठ— जहाँ आज वैदिक मंत्र, तांत्रिक विधि और प्रकृति-पूजन एक साथ जीवित हैं।
यह वही शक्ति है जिसकी स्तुति में कहा गया—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।”
प्राग्ज्योतिष और अरुणाचल
पुराणों में अरुणाचल क्षेत्र को प्राग्ज्योतिष कहा गया— जहाँ सबसे पहले सूर्य का प्रकाश पड़े।
यह केवल भौगोलिक सत्य नहीं,
आध्यात्मिक संकेत है— ज्ञान का प्रथम आलोक।
मणिपुर और महाभारत
जब कोई मणिपुर को “अलग” कहता है,
तो क्या वह यह भूल जाता है कि—
अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की राजकुमारी थीं
महाभारत केवल ग्रंथ नहीं, भारत की स्मृति है—
और मणिपुर उस स्मृति का अंग है।
संस्कृति अलग, संस्कार एक
संस्कृत में संस्कृति का अर्थ है— “संस्कारयति इति संस्कृति:” जो मनुष्य को संस्कारित करे, वही संस्कृति है।
उत्तर–पूर्व की संस्कृतियों में— प्रकृति को देवता माना गया पर्वत, नदी, वृक्ष पूज्य हैं,सामूहिक जीवन को प्राथमिकता है यही तो वैदिक दृष्टि है— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
(अथर्ववेद)
विविधता पर नहीं, उपहास पर लज्जा होनी चाहिए, किसी की आँखें छोटी हैं— तो क्या उसकी देशभक्ति भी छोटी हो जाती है?
किसी का पहनावा अलग है— तो क्या उसका त्याग कम हो जाता है?
जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि रूप नहीं, राष्ट्र भावना महत्वपूर्ण है, उस दिन भारत सच में एक होगा।
भारत एक देह है, उत्तर–पूर्व उसकी धड़कन
काशी आत्मा है,
तो कामाख्या शक्ति है।
यदि गंगा शिरा है,
तो ब्रह्मपुत्र प्राण है।
यदि राम भारत की मर्यादा हैं,
तो उत्तर–पूर्व भारत की मौन साधना है।
अंतिम संस्कृत संदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
जो अपने-पराए का भेद करता है, वह संकीर्ण है। उदार वही है,
जिसके लिए पूरा भारत एक परिवार है।
आज पूर्वोत्तर के जिन सात राज्यों को सात बहनों के नाम से हम जानते हैं, वे राज्य पश्चिम बंगाल और असम के विभाजन के फलस्वरूप स्वतंत्र रूप से अस्त्तिव में आए हैं। ये छोटे राज्य मणिपुर, मेघालय अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और मिजोरम हैं। प्राग्तिैहासिक काल के पन्नों को खंगालें तो पता चलता है कि भगवान परशुराम और कार्तवीर्य अर्जुन के बीच जो भीषण युद्ध हुआ था, उसके अंतिम आततायी को परशुराम ने अरूणाचल प्रदेश में जाकर मारा था। अंत में यहीं के ‘लोहित क्षेत्र‘ में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी में अपना रक्त-रंचित फरसा धोया था। बाद में स्मृतिस्वरूप यहां पांच कुण्ड बनाए गए, जिन्हें समंतपंचका रूधिर कुण्ड कहा जाता है। ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं। इस क्षेत्र में यह दंतकथा भी प्रचालित है कि इन्हीं कुण्डों में भृगुकुल भूशण परषुराम ने युद्ध में मारे गए योद्धाओं का तर्पण किया था। परशुराम यही नहीं रूके, उन्होंने शुद्र और इस क्षेत्र की जो आदिम जनजातियां थीं, उनका यज्ञोपवीत संस्कार करके उन्हें ब्रह्मण बनाया और सामूहिक विवाह किए।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व से पश्चिम की सामरिक और सांस्कृतिक यात्रा की। द्वारिका एवं माणिपुर में सैन्य अड्डे स्थापित किए। इसीलिए इस पूरे क्षेत्र की जनजातियां अपने को रामायण और महाभारत काल के नायकों का वंशज मानती हैं। यही नहीं ये अपने पुरखों की यादें भी जीवित रखे हुए हैं। सूर्यदेव को आराध्य मानने वालीं अरूणाचल की 54 जनजातियों में से एक मिजो-मिष्मी जनजाति खुद को भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी रूक्मणी का वंशज मनती हैं। दंतकाथाओं के अनुसार, आज के अरूणाचल क्षेत्र स्थित भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। उनके पिता का नाम भीष्मक एवं भाई का नाम रूक्मंगद था। जब कृश्ण रूक्मणी का अपहारण करने गए तो रूक्मंगद ने उनका विरोध किया। परमवीर योद्धा रूक्मंगद को पराजित करने के लिए कृश्ण को सुदर्शन चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पर रूक्मणि का ह्रदय पसीज उठा और उन्होंने कृष्ण से अनुरोध किया कि वे भाई के प्राण न लें, सिर्फ सबक सिखाकर छोड़ दें। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को रूक्मंगद का आधा मुंडन करने का आदेश दिया। रूक्मंगद का यही अर्द्धमुंडन आज सेना के जवानों की ‘हेयर स्टाइल‘ मानी जाती है। मिजो-मिष्मी जनजाति के पुरूष आज भी अपने बाल इसी तरह से रखते हैं। दिल्ली में निदो नामक जिस युवक के बालों पर नोकझोंक हुई थी, उसके बाल इसी परंपरागत तर्ज के थे। वास्तव में वह भगवान कृष्ण द्वारा निर्मित परंपरा का निर्वाह कर रहा था, जिस कृष्ण की पूजा उत्तर भारत समेत समूचे देश में होती है। यदि वाकई देश के लोग इस लोककथा से परिचित होते तो शायद निदो पर जानलेवा हमला ही नहीं हुआ होता?
मेघालय की खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 13 लाख है। यह जनजाति आज भी तीरंदजी में प्रवीण मानी जाती है। किंतु हैरानी यह है कि धनुष-बाण चलाते समय ये अंगूठे का प्रयोग नहीं करते। ये लोग अपने को एकलव्य का वंशज मानते हैं। यह वही एकलव्य है, जिसने द्रोणाचार्य के मागंने पर गुरूदक्षिणा में अपना अंगूठा दे दीया था। इसी तरह नागालैंड के शहर दीमापुर का पुराना नाम हिडिंबापुर था। यहां की बहुसंख्यक आबादी दिमंशा जनजाति की है। यह जाति खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानती है। दीमापुर में आज भी हिडिंबा का वाड़ा है। यहां राजवाड़ी क्षेत्र में स्थित शतंरज की बड़ी- बड़ी गोटियां पर्यटकों के आर्कशण का प्रमुख केंद्र्र हैं। किवदंती है कि इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र वीर घटोत्कच शतरंज खेलता था।
म्यांमार की सीमा से सटे राज्य माणिपुर के जिले उखरूल का नाम उलूपी-कुल का अपभ्रंश माना जाता है। अर्जुन की एक पत्नी का नाम भी उलूपी था जो इसी क्षेत्र की रहने वाली थी। तांखुल जनजाति के लोग खुद को अर्जुन और उलूपी का वंशज मानते हैं। ये लोग मार्शलआर्ट में माहिर माने जाते हैं। अर्जुन की दूसरी पत्नी चित्रांगदा भी मणिपुर के मैतेयी जाति से थी। यह जाति अब वैष्णव बन चुकी है। असम की बोडो जनजाति खुद को सृष्टि के रचीयता ब्रह्मा का वंशज मानती है। असम के ही पहाड़ी जिले कार्बी आंगलांग में रहने वाली कार्बी जनजाति स्वंय को सुग्रीव का वंशज मानती है। देश के तथाकथित मार्क्सवादी प्रगतिशील इतिहासकार रामायण और महाभारत कालीन पात्रों व नायकों को भले ही मिथक मानते हों,लेकिन यह मिथकियता पूर्वोत्तर राज्यों के रहवासियों को रक्त व धर्म आधारित सांस्कृतिक एकरूपता से जोड़ती है तो यही वह स्थिति है, जिसका व्यापाक प्रचार संर्कीण सोच के लोगों को खंडित मानसिकता से उबार सकता है। हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, लोक और दंत कथाओं में ज्ञान के ऐसे अनेक स्रोत मिलते हैं,जो हमें सीमांत प्रदेषों में भी मूल भारतीय होने के जातीय गौरव से जोड़ते हैं। लिहाजा जरूरी है कि हम सांस्कृतिक एकरूपता वाली इन कथाओं को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करें ? पूर्वोत्तर राज्यों में रक्तजन्य जातीय समरसता के इस मूल-मंत्र से जातीय एकता की उम्मीद की जा सकती है।
(इनपुट – प्रवक्ता डॉट कॉम)





