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-दिव्या गुप्ता
टाटानगर की यात्रा जब शुरू हुई तो शुरुआत सामान्य ही थी । समय पर भागलपुर से ट्रेन हावड़ा के लिए मिल गई थी। हावड़ा से जनशताब्दी एक्सप्रेस में टिकट पहले से ही ले रखा था, पर सुबह 03.30 बजे हावड़ा पहुँचकर पता चला, वह देर से चलने वाली है । खैर, दूसरी ट्रेन में लड़ते-भिड़ते जनरल बोगी में जगह लेकर मैं जमशेदपुर पहुँच गई। जमशेदपुर पहुँचकर पता चला कि इस तरफ़ की ट्रेन हमेशा ही देर करती है । जमशेदपुर में ठंड बहुत थी। चूंकि स्टेशन से ‘विकास भवन’की ज़्यादा दूरी नहीं थी, इसलिए आसपास का बाज़ार ज़्यादा नहीं देख पाई। जमशेदपुर के ‘विकास भवन’ में कार्यशाला का प्रारंभ सामान्य तरीके से जैसे हर बार होता है, वैसे ही हुआ । विकास भवन के पीछे फल
और सब्ज़ियों का बगीचा था। इसमें टमाटर,मिर्च,पालक, लहसुन, लौकी, अमरूद, केला आदि लगे हुए थे। विकास भवन में जितने दिनों तक हम थे, हमने इसी बगीचे की सब्जियाँ खाईं।
तीसरे दिन हमलोग क्षेत्र-भ्रमण के लिए गए। जमशेदपुर एक शहर है जिसमें सामान्य शहर की तरह जो भी सुविधाएँ होनी चाहिए थीं, वे उपलब्ध थीं। परंतु उसका गाँव उससे थोड़ा अलग है। हमारा उद्देश्य गाँव की तरफ़ जाना था। मैं, ‘संवाद’संस्था की कार्यकर्ता श्रावणी आंटी के साथ ‘पटकीता’ गाँव गई। गाँव के रास्ते में सड़क के दोनों ओर पेड़-पौधे और झाड़ियाँ थे। मानो हम किसी जंगल की तरफ़ बढ़े जा रहे हैं। आसपास ज़्यादा लोग नहीं थे। फिर धीरे-धीरे आबादी और बसावट आते गये। बीच-बीच में सड़क के किनारे जंगल आता था। हम गाँव की तरफ बढ़ रहे थे तो हमने रास्ते में सड़क किनारे मिट्टी के घर में दो बहनों को दीवार पर रंग द्वारा सजावट करते हुए देखा । मैं उनके पास गई तो उनके चेहरे पर जिज्ञासा और एक मुस्कान थी। हमने उनका नाम पूछा, एक लड़की का नाम नेहा, दूसरी का नाम मोनिका और उसके भाई का नाम विशाल था। जब हमने उनसे इस सजावट का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पाँच साल में एक बार एक त्योहार आता है। उसी की तैयारी चल रही है। दोनों ने कहा कि जितने भी रिश्तेदा रहैं, कल सभी आएँगे। जिन बहनों का विवाह हो चुका है, वह भी अपने पति के साथ और बुआ भी अपने परिवार के साथ आएँगी। मेरे लिए आश्चर्य की बात यह थी कि उनके पास रंग, तूलिका के अलावा किसी तरह का कोई भी साँचा न था। वे दीवार पर रेखाएँ भी धागे द्वारा बना रहीं थीं। उनकी उम्र बारह-चौदह वर्ष से अधिक न होगी। उनके साथ उनका भाई भी था जो छह-सात वर्ष का था। वे साथ मिलकर कलाकारी कर रहे थे। उन बच्चियों ने किसी शिल्पी से कुछ सीखा होगा, यह मुझे नहीं लगता। उन्होंने अपने जीवन में परिवार और आसपास के लोगों से ही सीखा होगा ।पहले पारम्परिक रंग फूल एवं मिट्टी से बनाया जाता था परंतु अब बाज़ार की सुविधा के कारण बना-बनाया रंग ही वे लेआते हैं और अपनी मिट्टी की दीवार पर अपनी कला बिखेरते हैं।
इससे थोड़ी दूर पर एक और घर मिला जिसमें एक गृहिणी अपने घर की दीवार पर पारम्परिक और आधुनिक मिश्रित कला बिखेर रही थीं। वे कुछ अधिक समृद्ध थे। घर मिट्टी का था, परंतु जगह अधिक थी। हमें घर के अंदर जाकर छत की खपरैल ठीक करते हुए पुरुष दिखे। उनके रसोईघर में चूल्हे और मिट्टी के बर्तन थे। कई सुराहियाँ बाँस से लटकी हुई नज़र आईं जो वास्तव में कबूतर के घोंसले थे। जहाँ हम खड़े थे उसके पास एक अंधेरा कमरा था जिसमें बिना पूछे मैं चली गई। शायद वहाँ जाना निषेध था। उसमें एक ओर पत्ते से बने दोने और पत्तल रखे हुए थे। दूसरी तरफ चार-पाँच मिट्टी की सुराही थी। उसके अंदर चावल था जिसे सड़ाया जा रहा था। इसका प्रयोग अगले दिन के त्योहार में पुरुषों को प्रसाद के रूप में देने के लिए किया जाता है। इसे वहाँ की सामान्य भाषा में ‘हँड़िया’ कहा जाता है। इसे अधिक पीकर आदिवासी समाज में लोग नशा करते हैं। इस नशे ने ही कई तरह से आदिवासियों का जीवन नष्ट किया है। जिस गाँव हम जा रहे थे, उस गाँव में ज़्यादातर लोग खेती से अपना जीवन यापन करते हैं। खेती और हँड़िया ही इनके जीवन की दिनचर्या बनती जा रही है।
इस तरह हमलोग पटकिता गाँव पहुँचे ।इस गाँव के प्रधान की मृत्यु होने के कारण सचिवालय में ताला लगा था। सचिवालय के बाहर गुनगुनी धूप में मासूम बकरी के बच्चे आपस में खेलते दिखे। गाँव में जाते ही मोबाइल का नेटवर्क गायब हो गया था। जब मैंने एक ग्रामीण महिला से पूछा कि ‘नेटवर्क किस तरफ आएगा?’ तो उन्होंने इमली के पेड़ की तरफ़ इशारा किया। मैं उस ओर नेटवर्क की तलाश में निकल पड़ी। नेटवर्क का तो ज़्यादा पता न चला पर इमली ज़रूर मिल गयी। वह ऊपर पेड़ पर लटक रही थी। मुझे आसपास झाड़ दिखे पर वैसा कोई डंडा नहीं दिखा जिससे मैं इमली तोड़ सकूँ। मैंने एक-दो पत्थर भी उठाकर मारा, पर असफल रही। तभी दो लड़कियाँ मेरी ओर आती हुई मुझे दिखाई दीं। एक लड़की विवाहित गृहिणी लग रही थी और दूसरी कॉलेज की विद्यार्थी। मुझे देखते ही उन्होंने यह तो समझ लिया कि मैं बाहर से आई हूँ। उन्होंने पूछा आप यहाँ क्यों आईं हैं? मैंने अपने आने का उद्देश्य बताया। इसके साथ ही इमली पाने की लालसा भी ज़ाहिर की। उस लड़की ने अगल-बगल देखा और एक लकड़ी उठा लाई और एक से दो बार के वार में ही उसने इमली तोड़कर मुझे दे दिया । उसने इमली तोड़ने से पूर्व मुझसे यह पूछा भी था कि आपको कितनी इमली चाहिए? ज़्यादा लेकर खराब नहीं करनी है। यही हमारे यहाँ का सिद्धांत है। इमली तोड़कर देने के बाद वह तो चली गई और जाते-जाते अपने अंदर के आदिवासी मन की एक सीख मुझे दे गई। मुझे लगा शहर ने ज़्यादा से ज़्यादा जमा करने की प्रवृत्ति दी है जबकि यहाँ किसी बात की लूट की कोई होड़ नहीं मची है ।
इमली खट्टी और कच्ची थी जिसे मैंने खा लिया। सामने एक सुंदर साफ-सुथरा तालाब था। मैं तालाब और उसमें खिले कमल देखने के लिए बढ़ चली। उसके आगे दूर एक पहाड़ था। प्रकृति की सुंदर छवि धूप में खिलखिला रही थी। जाने का मन न था पर देर ज़्यादा न हो इसीलिए मैं वापस लौट आई। लौटते ही एक स्थानीय निवासी से भेंट हुई। उनसे गाँव की व्यवस्थाए वं नियम के संबंध में मेरी काफ़ी बातचीत हुई। उस व्यक्ति ने स्वयं घर से भागकर विवाह किया था परन्तु आदिवासी महिलाओं को ऐसा अधिकार नहीं है। उसके तीन बच्चे थे। सारी बातचीत का विषय सगोत्रीय विवाह न होना ,पुरुषों का ज़मीन पर अधिकार, हल चलाने के अधिकार, छत छाने के अधिकार से संबंधित था। इन सारी व्यवस्था में जब मैंने बदलाव के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि इन सब के बीच कोई परिवर्तन करें तो संभव हो सकता है। अकेले हमारे करने से नहीं होगा। उन्होंने यह भी बताया कि आप आदिवासी हो या न हो। आप यहाँ रहना चाहें तो रह सकते हैं। खेतों में काम करना होगा और सामुदायिक तौर पर सहयोग के साथ रहना होगा।
जहाँ मैं बात कर रही थी उसी के ठीक सामने वाले घर की महिला गोबर से अपना आँगन लीप रही थी। वह चापाकल से पानी भरने आईं थीं। उनसे बात करते हुए पता चला कि यह इमली का पेड़ इनका ही है। उनके घर की तरफ़ बढ़ते हुए, उन्होंने अपने आँगन के बगीचे दिखाए। उनके घर के पुरुषों से भी काफ़ी बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि सामाजिक व्यवस्था में पुरुष – वर्चस्व पर अकेले नहीं सोचा जा सकता है। सभी के सामुदायिक प्रयोग से परिवर्तन संभव हो पाएगा । वे अपने स्तर पर अपनी पत्नी की सहायता करते हैं। उनका पुत्र आठ-दस वर्ष का है जिसका नाम विष्णु है। वह मेरा दोस्त बन गया । जब मैंने उससे पीने के लिए पानी माँगा तो वह अंदर चला गया और थोड़ी देर से पानी लेकर आया। पानी गर्म था। उसमें मिट्टी की ख़ुशबू आ रही थी। उसने मुझे चूल्हे में लकड़ी जलाकर झरने का पानी गर्म करके दिया था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था कि इतने छोटे लड़के को चूल्हा जलाने आता है। विष्णु के पिता ने बताया कि हम अपने बच्चों को साथ-साथ खेतों में ले जाते हैं। घरेलू कामों में सहयोग के लिए कहते हैं। यह उनके जीवन जीने का तरीका है। उनका मत है कि जैसे विद्यालयी शिक्षा आवश्यक है, वैसे ही घर, खेत, द्वार के काम जीवन में शिक्षा का हिस्सा है। इससे अपने परिवार, समाज, परंपरा और जीवनशैली के प्रति आस्था एवं विश्वास बच्चों में बढ़ते हैं। उनके आँगन में उबले धान सूखने के लिए रखे हुए थे जिसे कोई बच्चा हाथ नहीं लगा रहा था क्योंकि उसके सूखने का महत्त्व और ज़रूरत वे जानते थे।
इसके अलावा मैंने देखा। अंदर संयुक्त परिवार की गृहस्थी जमी हुई थी। भ्रमण का दिन बृहस्पतिवार था। इस दिन पूरे घर को गोबर से लीपकर चावल पीसकर आँगन, चौखट,द्वार पर अल्पना बनायी जाती है। उस घर की महिलाओं से बातचीत के दौरान उन्होंने यह बताया कि उन्हें समाज में नीचे और कम अधिकार की सहायिका माना जाता है। उनके जन्मगत इस भेद को दूर करने की नियति का इंतज़ार उन्हें भी है। इसके बाद मैंने एक-दो घरों के बगीचे से संतरे तोड़े। किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं थी क्योंकि शर्त यही थी कि आप चीज़ खराब न करें।
हम उस गाँव से आगे एक ‘बिदु-चाँदन पुस्तकालय’ भी गए। वह छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षा से लेकर खेलकूद तक के प्रशिक्षण की व्यवस्था मुफ़्त में करता है। यह पुस्तकालय उस गाँव में नौकरी करने वाले लोग अपने सहयोग से चलाते हैं। इस पुस्तकालय को किसी प्रकार का कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता है। विद्यार्थियों से भी कोई राशि नहीं ली जाती है। लगभग सात-आठ वर्षो से यह चल रहा है। मिरजा हाँसदा पुस्तकालय के एक कार्यकर्ता हैं जिनसे हमारी मुलाक़ात हुई ।वे सरकारी विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते हैं। ‘बिदु-चाँदन’आदिवासी समाज में सरस्वती की तरह माने जाते हैं। मान्यता है कि संथाली भाषा की ‘ओलचिकी’ लिपि इन्होंने ही बनाई थी। बिदु-चाँदन प्रेमी-प्रेमिका थे। वे गाँववालों से बचकर एक दूसरे से वार्तालाप के लिए दीवार पर कुछ प्रतीक चिह्न बनाते थे, जिसे केवल ये दोनों ही समझते थे। इस तरह‘ओलचिकी लिपि’का जन्म हुआ। पं. रामचंद्र मुर्मू ने सन् 1925 में संथाली भाषा की लिपि ‘ओलचिकी’ को सबके सामने प्रस्तुत किया था ।
इसके बाद हमने बगल के दूसरे गाँव में ग्रामसभा के प्रधान से मुलाक़ातकी। उनसे बातचीत के दौरान गाँव के बहुत पुराने और वृद्ध व्यक्ति ने ‘बिदु-चाँदन’ के गीतों को अपने पारम्परिक वाद्ययंत्र ‘बनम’ बजाकर सुनाया। ‘बनम’ के तार घोड़े की पूँछ के बाल से बनते हैं। गाँव की व्यवस्था और सामाजिक नियमों पर चर्चा करते हुए स्त्रियों की भागीदारी में परिवर्तन की संभावनाओं को भी कुछ लोगों ने स्वीकार किया। कुछ लोग बिफर गए। उनका मत था कि परंपरा में बहुत से परिवर्तन को स्वीकार किया है परंतु ज़मीन, छत, हल एवं गैर– आदिवासी से विवाह पर महिलाओं को अधिकार देने से उनकी सारी परम्परा का आधार ही नष्ट हो जाएगा। वास्तव में पुरुषों के वर्चस्व के कुछ अंश ही बचे हैं जिन्हें वे बचाए रखना चाहते हैं ।
वहाँ से हम भोजन के लिए गए। हमने पत्ते से बने पत्तल में भोजन किया। वहाँ किसी के भी घर बिना किसी की इजाज़त के जा सकते हैं। उनके सभी घर प्राय: मिट्टी के बने हुए थे। उन पर अपनी पारम्परिक कलाकृतियों द्वारा दीवार सजायी गयी थी । घर के बाहर मिट्टी का चबूतरा बना हुआ था। उन्होंने दीमक से बचाने के लिए पुआल और गोबर मिलाकर लीप रखा था। वे बैलों का प्रयोग छोटे-छोटे खेतों में करते हैं। ट्रैक्टर महिला चला सकती है परंतु पारम्परिक हल को हाथ लगाना भी अपराध माना जाता है। गाँव की मदईत व्यवस्था में नौकरी करने वाले युवाओं के कारण कमी आयी है। खेतों में काम करने वाले पुरुष उन महिलाओं की सहायता करते हैं, जिनके घर में पुरुष नहीं हैं। प्रत्येक घर में वृद्ध,युवा, बच्चे थे। सामूहिकता एवं संयुक्त परिवार थे। आदिवासी ग्रामीण पुरुष अपने ग्राम से जुड़े और खेती-बारी में रहना ज़्यादा पसंद कर रहे हैं। वह खेती का समय नहो होने पर दिहाड़ी मज़दूरी के लिए गुजरात, बंगाल, राँची, केरल, कर्नाटक कुछ महीनों के लिए चले जाते हैं। या सरकारी योजनाओं के तहत किसी काम में मज़दूरी करने लगते हैं, परंतु धन अर्जित करने के लिए पूरी तरह से शहरों का रुख़ नहीं करते हैं। वह खेती द्वारा जीविकोपार्जन चला रहे हैं। आँगन में ही सब्ज़ी उगाते हैं। केवल तेल, कपड़े और अन्य वस्तुओं के लिए बाज़ार की आवश्यकता महसूस करते हैं।
गाँव में सालगेजी के माता-पिता से भी मेरी मुलाक़ात हुई। वे नब्बे वर्ष से अधिक के हो गए हैं परंतु उनकी सक्रियता में बच्चों-सी चहक थी। उन्होंने बहुत स्नेह एवं प्रेम दिया। मुझे अपने आँगन के संतरे देते हुए उसे खाने का समय और शारीरिक उपयोगिता भी बताई। वे घर के बाहर तक छोड़ने भी आए। उन दोनों के चेहरे की चमक ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनकी हथेलियों को जब मैंने हाथ लगाया तब लगा काश, मेरे पास कोई जादू होता और उनके हाथों में श्रम के जो महाकाव्य बने हैं, उन्हें मैं खींच लेती।
ग्रामसभा के सदस्यों से भेंट के दौरान कई वृद्ध महिलाएँ किनारे बैठी थीं। उन सभी ने अपने नाम द्वारा अपना परिचय दिया। कई महिलाएँ अपना नाम भूल गई थीं, उनका सोचते हुए अपना नाम बताना इसी का परिचायक है। वे अपने परिवार और दूसरे के लिए करने में इतनी व्यस्त रहीं पूरे जीवन कि उन्हें अपना नाम तक याद नहीं । हम बाहर से जिस आदिवासी समाज को इतना सुंदर और सुसज्जित प्रगतिशील मानते हैं। उनके अंदर वास्तव में पुरुषों का नकारापन, महिलाओं का आश्रय पाने की मजबूरी है। वे काम करती हैं ताकि जीवन में पैसे की कमी कम हो सके। ज़मीनी हकीकत यह है कि हर हाल में पुरुषों का ही अधिकार है। उनकी मजबूरी है कि उन्हें पति, पिता, भाई के आश्रय में ही रहना है। उम्मीद है कि व्यवस्था कभी न कभी बदलेगी।
कई महिलाएँ अब अधिकार की और माँग नहीं कर रही हैं क्योंकि उन्हें घर-बाहर दोनों जगह अकेले काम करना पड़ रहा है। पुरुष नशे में पड़े रहते हैं। यदि हल, छत, ज़मीन का अधिकार भी मिल जाएगा तो पुरुष और भी कुछ नहीं करेंगे ।महिलाएँ पढ़ाई से लेकर काम,अपने परिवार और खुद की आत्मनिर्भरता के लिए करती हैं। ज़मीन पर अधिकार न होने के कारण उनकी सारी मेहनत किसी अन्य के हाथ चली जाती हैं। महिला की मृत्यु पर उन्हें दूर खेतों में दफ़न किया जाता है जबकि पुरुषों को अपने ही आँगन में दफ़नाया जाता है। यदि किसी लड़की ने विवाह नहीं किया है तब भी उसे दूर खेत में ही दफ़न किया जाता है। माना जाता है कि महिला का अधिकार नहीं है। वह दूसरे घर से आई है। उसका इस ज़मीन पर अधिकार नहीं पुत्र का ही संपत्ति पर अधिकार होता है। कमाल की बात है कि महिला राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक होकर सत्ता संभालने का अधिकार प्राप्त कर लेती हैं परंतु उसे हल, छत, ज़मीन पर अधिकार नहीं है ।
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