Friday, April 4, 2025
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अफगानिस्तान मुद्दे पर मुखर हुए सभी धर्मों के लेखक

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘काबुल:तब और अब’ विषय पर  एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर  अफगानिस्तान और भारत के बीच प्राचीन काल से बने ऐतिहासिक  संबंध को याद किया गया। इस वेबिनार में सभी धर्मों के लेखकों ने अफगानिस्तान में जारी हिंसा, आतंक और भय पर चिंता व्यक्त करते हुए इस देश में भारत द्वारा किए गए विकास कार्यों को याद किया। सभी ने  सुरक्षा, शांति तथा लोकतंत्र की पुनःप्रतिष्ठा की कामना की। परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने साहित्यकारों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें कभी ऐसा लगा नहीं कि अफगानिस्तान भारत में नहीं है। वहां के इतने खूबसूरत लोग, इतने बढ़िया मेवा, वहां के बर्फ़ से ढके पहाड़ मुझे हर क्षण बद्रीनाथ, केदारनाथ और कश्मीर की वादियों में पहुँचाते रहे हैं। युवा आलोचक आशीष मिश्र ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को साहित्यिक दृष्टि से देखते हुए कहा कि राजनीति का देश और कलाओं का देश हमेशा एक नहीं हो सकता। वह अलग-अलग होता है। राजनीति का देश बहुत सीमित होता है और कलाओं का देश बहुत सुविस्तृत होता है और सामान्यतः पूरी मनुष्यता तक फैला हुआ होता है। वरिष्ठ कवि शहंशाह आलम ने भारत-अफ़ग़ान की मैत्रीपूर्ण रिश्तों की गर्माहट को महसूसते हुए कहा कि अफ़ग़ान और भारत का जो मानवीय रिश्ता है, वह बना रहना चाहिए और वहां की मौजूदा स्थिति पर नजरें टिकाएं रखने की जरूरत है। इस अवसर पर उन्होंने ‘काबुलीचना’ कविता का पाठ किया। कहानीकार तबस्सुम निहां ने मुख्यतः वहां की महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर कहा कि जिस तरह तालिबानी वहां की महिलाओं के अधिकारों का हनन कर रहे हैं, ऐसे हालात में वहां की महिलाओं पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शम्भुनाथ ने कहा कि “एशिया में गौतम बुद्ध हुए थे और उन्होंने शांति, अहिंसा और मैत्री की बात की थी। एशियाई देशों के खिलाफ साजिश से निपटने के लिए सारे बुद्धिजीवियों, मानवताप्रेमियों और सभी धर्मों के लोगों को एक स्वर में प्रतिरोध करना होगा।” कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य में सृजन एक गहरी बेचैनी का मामला है और आज हमारे पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, वह पूरी तरह मानवजाति और लोकतंत्र पर एक हमले की तरह है। इस अवसर पर देशभर से साहित्य और संस्कृति प्रेमियों ने हिस्सा लिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ केयूर मजूमदार ने दिया।

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