Monday, February 16, 2026
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अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट में खुद जिरह कर हासिल की मेडिकल सीट

-प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की पर ईडब्ल्यूएस होने पर नहीं मिली मेडिकल सीट 

-10 मिनट में पाई अनुमति 

 भोपाल । फरवरी की एक शाम। अदालत का कामकाज लगभग समाप्ति पर था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ उस दिन की सुनवाई समाप्त करने की घोषणा करने ही वाली थी तभी एक आवाज सुनाई दी कि मुझे दस मिनट का समय देंगे? किसी वरिष्ठ वकील की नहीं बल्कि अदालत कक्ष में मौजूद एक किशोर की इस अपील ने मुख्य न्यायाधीश को चौंका दिया। इसलिए न्यायाधीशों ने उसकी बात सुनने की अनुमति दे दी। और वही 10 मिनट में 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी की जिंदगी बदल गई। मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी अथर्व ने कक्षा 12 उत्तीर्ण की है। अभावों में पले-बढ़े अथर्व की आंखों में डॉक्टर बनने का बड़ा सपना है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) उन्होंने दो बार पास की। 530 अंक भी प्राप्त किए लेकिन केवल सरकार की नीतिगत अक्षमता के कारण उनका सपना साकार नहीं हो पाया। कारण यह कि सरकारी कॉलेजों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) कोटे में उन्हें प्रवेश नहीं मिल सका। वहीं निजी कॉलेजों में मध्य प्रदेश सरकार अब तक यह कोटा लागू ही नहीं कर सकी है। परिणामस्वरूप प्रवेश परीक्षा पास करने के बावजूद पैसों की कमी से वह मेडिकल पढ़ाई का अवसर नहीं पा सके। भरी अदालत में अथर्व की याचिका और दलीलें सुनने के बाद संविधान के अनुच्छेद 142 के विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ और मध्य प्रदेश प्रशासन को निर्देश दिया कि 2025–26 शैक्षणिक सत्र के भीतर ही इस नीट-उत्तीर्ण अभ्यर्थी को निजी कॉलेज में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत प्रवेश का अवसर दिया जाए। शीर्ष अदालत की टिप्पणी थी कि राज्य की नीति लागू करने में देरी के कारण किसी योग्य छात्र को मेडिकल शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। नीट के साथ-साथ इंजीनियरिंग में भी अथर्व का चयन हुआ था लेकिन उनका सपना डॉक्टर बनना है। इसलिए जब नीट में सफल होने के बाद भी ईडब्ल्यूएस कोटे के कारण मेडिकल पढ़ाई का सपना अटक गया तो सबसे पहले उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहां उनकी दलील सुनकर न्यायाधीश ने व्यंग्य करते हुए कहा था डॉक्टर नहीं तुम्हें तो वकील होना चाहिए। गलत पेशा चुन रहे हो लेकिन इस टिप्पणी से अथर्व का मनोबल नहीं टूटा। अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं हालांकि उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की। कोविड लॉकडाउन के दौरान जब अदालतों में वर्चुअल सुनवाई शुरू हुई तब अथर्व ने ही पिता की मदद की। मनोज के शब्दों में – मेरे बेटे ने कभी कानून की पढ़ाई नहीं की लेकिन कोविड के समय उसने ऑनलाइन सुनवाई देखी। मुझे याचिका स्कैन कर अपलोड करने में भी मदद की। उसी अनुभव का उपयोग करते हुए अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से ‘स्पेशल लीव पिटिशन’ का प्रारूप डाउनलोड किया। पूर्व मामलों के फैसलों को ध्यान से पढ़ा फिर अपनी स्पेशल लीव पिटिशन का मसौदा तैयार किया। रजिस्ट्री की आपत्तियों को ठीक कर 6 जनवरी को ऑनलाइन याचिका दाखिल कर दी। यात्रा और दिल्ली में रहने का खर्च बचाने के लिए जबलपुर से ही पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन पूरी की। इस मामले में स्कूल की शिक्षिकाओं मित्रा मैडम और भारती मैडम ने भी उसकी मदद की। कम खर्च होने के कारण अथर्व की पढ़ाई महर्षि स्कूल में कराई गई थी। वहां इन दोनों शिक्षिकाओं ने उसे काफी सहयोग दिया ऐसा उसके पिता ने बताया। इसके बाद फरवरी में वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उस दिन उनकी याचिका सुनी नहीं जाएगी यह समझकर आखिरी क्षण में अथर्व ने भरसक प्रयास किया और उसी में सफलता मिली। हालांकि यहां एक प्रश्न बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को सात दिनों के भीतर अथर्व के प्रवेश की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत फीस कितनी होगी इस पर कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं है। आशंका के बावजूद बेटे को निराश नहीं करना चाहते मनोज। अब तक बेटे को वही पढ़ाते थे। गर्वित पिता ने कहा कि मेरे बेटे ने कभी किसी चीज की जिद नहीं की। इस एक बार अपने सपने को पूरा करने के लिए उसने जिद की और इतनी दूर तक पहुंचा है। उसके सपने को पूरा करने के लिए जो भी करना पड़े, मैं तैयार हूं।

 

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