-आज भी कायम ब्रिटिश कालीन रीत
हावड़ा। हावड़ा के पंचाननतला की संकरी गलियों में स्थित देवी सरस्वती का शताब्दी प्राचीन मंदिर श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत एक उत्कृष्ट परंपरा का वाहक बना हुआ है। एक नंबर उमेश चंद्र दास लेन स्थित यह सरस्वती मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला के साथ साथ 103 साल पुरानी अटूट परंपरा के लिए भी जाना जाता है।
इस मंदिर की नींव 28 जून, 1923 को रखी गई थी। ब्रिटिश शासनकाल से ही यहां विद्या की देवी मां सरस्वती की नित्य पूजा का विधान चला आ रहा है। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, इसे बंगाल के सबसे प्राचीन सरस्वती मंदिरों में से एक माना जाता है। मंदिर का नाम हावड़ा जिला स्कूल के पूर्व प्रधानाध्यापक उमेश चंद्र दास के नाम पर है। मंदिर में प्रतिष्ठित मां सरस्वती की चार फुट ऊंची प्रतिमा श्वेत पत्थर से निर्मित है, जिसे उमेश चंद्र दास के पुत्र रणेश चंद्र दास ने विशेष रूप से जयपुर से मंगवाया था। हंस पर विराजमान और हाथ में वीणा धारण किए हुए मां ‘महाश्वेता’ का यह रूप अत्यंत मनमोहक है।
इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा ‘108 मिट्टी के पात्र’ हैं। सरस्वती पूजा के दिन देवी को 108 मिट्टी के सकोरों में बताशा और फल अर्पित किए जाते हैं। मंदिर के स्थापना काल से शुरू हुई यह रीत आज एक सदी बाद भी अपरिवर्तित है। वसंत पंचमी के अवसर पर पूरे मंदिर को बसंती रंग की आभा से सजाया जाता है, जहां छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का तांता लगा रहता है।





