कोलकाता । प्रख्यात बंगाली साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी, जिन्हें उनके लेखकीय नाम ‘शंकर’ के रूप में जाना जाता है, का शुक्रवार को निधन हो गया। 92 वर्षीय लेखक ने गत 20 फरवरी को एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह अपने पीछे दो बेटियों को छोड़ गए हैं। साहित्यकार शंकर ने शहरी जीवन की साधारण दिखने वाली वास्तविकताओं को कालजयी कथाओं में रूपांतरित किया। उनकी कई कृतियों पर विख्यात फिल्मकार सत्यजीत रॉय ने फिल्में बनाईं, जिनमें ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित शंकर अपने चर्चित उपन्यास ‘चौरंगी’ के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं। इस उपन्यास ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। बारिश से भीगे कोलकाता और ग्रैंड होटल की रोशनी से प्रेरित यह उपन्यास काल्पनिक ‘शाहजहां होटल’ की दुनिया के माध्यम से महानगर के अभिजात्य समाज, व्यापारिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करता है।
‘चौरंगी’ पर 1968 में बनी फिल्म ने भी अपार लोकप्रियता हासिल की और यह कृति कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई। शंकर की कृतियां साहित्य और सिनेमा के बीच एक सशक्त सेतु बनीं। ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ सत्यजीत रॉय की चर्चित ‘कलकत्ता त्रयी’ का हिस्सा रहीं। इसके अलावा उनके उपन्यास ‘मन सम्मान’ पर हिंदी फिल्म ‘शीशा’ का निर्माण हुआ।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कलकत्ता उच्च न्यायालय में अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर नोएल बारवेल के क्लर्क के रूप में की थी। अपने गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘कतो अजानारे’ की रचना की, जिससे उनके साहित्यिक जीवन की औपचारिक शुरुआत हुई।
शंकर का साहित्य केवल शहरी जीवन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवाओं के लिए भी व्यापक लेखन किया और संस्मरणात्मक कृतियों में सामाजिक टिप्पणियों के साथ स्मृतियों को सजीव रूप दिया। उनके लेखन में स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित शोधपरक कृतियां भी शामिल हैं, जिनमें आध्यात्मिक और मानवीय दोनों पक्षों को उकेरा गया।
वर्ष 2021 में उन्हें आत्मकथात्मक कृति ‘एका एका एकाशी’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तकों का अनुवाद अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, गुजराती, फ्रेंच और स्पेनिश सहित कई भाषाओं में हुआ।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “बंगाली साहित्य का उज्ज्वल नक्षत्र” बताया और कहा कि उनका निधन सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
शंकर ने अपने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता-उत्तर भारत के शहरी समाज की आकांक्षाओं, द्वंद्वों और नैतिक उलझनों को सजीव रूप दिया। उनके निधन से न केवल एक लोकप्रिय उपन्यासकार का अंत हुआ है, बल्कि उस साहित्यिक युग का भी समापन हुआ है जिसने महानगर के जीवन को अमर शब्दों में ढाला।




