कोलकाता । रामकथा को लोकोन्मुखी बनाकर गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृति को संवारने और समाज को बचाने का अभूतपूर्व कार्य किया। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति का संपूर्ण परिचय तो है ही, लोक जागरण के सूत्र भी हैं। अपने संग्रह त्याग, विवेक का परिचय देते हुए उन्होंने रामकथा को परिमार्जित कर उसका विमल रूप प्रस्तुत किया है।’ ये उद्गार हैं लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष प्रो० हरिशंकर मिश्र के, जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वावधान में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर प्रधान वक्ता बोल रहे थे। समारोह के अध्यक्ष प्रसिद्ध उद्योगपति, समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता डॉ विट्ठलदास मूंधड़ा ने सनातन मूल्यों पर हो रहे चौतरफा प्रहार पर चिंता व्यक्त करते हुए अस्मिता की रक्षा और संस्कृति के संरक्षण हेतु तुलसी साहित्य के प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया। समारोह का शुभारंभ जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत रुद्राष्टकम से हुआ। स्वागत भाषण देते हुए पुस्तकालय के उपाध्यक्ष डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने तुलसी जयंती के साथ प्रेमचंद के जन्मदिवस के संयोग की चर्चा करते हुए कहा कि एक रामकथा के गायक हैं और दूसरे ग्रामकथा के रचनाकार। दोनों ने समाज को नई दिशा प्रदान की। इस अवसर पर जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा रामलला नहछू की संगीतमय प्रस्तुति ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। अतिथियों का स्वागत महावीर प्रसाद बजाज, अरुण प्रकाश मल्लावत, विश्वंभर नेवर, सागरमल गुप्त, विधुशेखर शास्त्री ने किया। कार्यक्रम का संचालन पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने एवं धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालयाध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया। इस अवसर पर शंकर लाल सोमानी, डॉ सत्या उपाध्याय, डॉ वसुमति डागा, डॉ तारा दूगड़, कमलेश मिश्र, विजय पाण्डेय, नंदलाल सिंघानिया, वंशीधर शर्मा, प्रियंकर पालीवाल के साथ साथ अन्य गणमान्य लोगों की गरिमामयी उपस्थिति रही। समारोह की सफलता में भगीरथ सारस्वत, श्रीमोहन तिवारी, पलक सिंह तथा सैकत मन्ना की सक्रिय भूमिका रही।