क्या सरकार के पास देने के लिए नौकरी नहीं ? क्या पेपर लीक के पीछे कोचिंग सेंटर रैकेट का हाथ है? यह सवाल इसलिए क्योंकि देश में सरकारी नौकरियों के लिए और डॉक्टरी व इंजीनियिंग के तमाम संस्थानों में प्रवेश के ली जाने वाली परीक्षाओं के परचे लगातार लीक हो रहे हैं। पिछले ढाई दशकों से इस तरह की घटनाएं आम हो गयी हैं। सरकार यूपीए की हो या एनडीए की, लीकेज पर विराम नहीं लगा और कार्रवाई भी नहीं हुई। किंग पिन कौन था, पता नहीं चला । किसी मंत्री ने इस्तीफा भी नहीं दिया। सरकारें बदलीं, सूरत ए हाल नहीं बदला, ठगी गयी आम जनता और दोराहे पर खड़ी है युवा पीढ़ी । सबसे स्याह और चिंताजनक पहलू यह है कि परीक्षा माफियाओं के खिलाफ सरकारी तंत्र की कार्रवाई केवल फाइलों तक सीमित है। इन 152 पेपर लीक की घटनाओं के कारण देश के 7.5 करोड़ से अधिक छात्र सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं।
एनडीए के 12 साल में 152 पेपर लीक हुए
कांग्रेस द्वारा जारी की गई ‘छात्रों की गूंज’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2014 से 2026 के बीच देश में 152 पेपर लीक के मामले दर्ज किए गए हैं, जिनसे करीब 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित हुए हैं। इस राष्ट्रीय संकट में दिल्ली/केंद्रीय परीक्षाएं 38 मामलों के साथ शीर्ष पर हैं, जबकि राज्यों में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पेपर लीक सिंडिकेट के मुख्य गढ़ बने हुए हैं।
इस आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय (2014 से 2026 तक) में देश के विभिन्न हिस्सों में कुल 152 पेपर लीक की पुष्टि हुई है. यह आंकड़ा केवल बड़ी और सुर्खियों में रहने वाली परीक्षाओं का नहीं है, बल्कि इसमें राज्यों के छोटे-छोटे विभागों की क्लर्क भर्ती से लेकर देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (नीट) तक शामिल हैं।
जब इन 152 मामलों की राज्यवार सघन समीक्षा की जाती है, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय एजेंसियां और कुछ विशिष्ट राज्य इस धांधली के सबसे बड़े हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं।
दिल्ली और केंद्रीय परीक्षाएं (38 मामले)
देश की राजधानी और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं का संचालन करने वाली केंद्रीय संस्थाएं इस सूची में सबसे ऊपर हैं। केंद्रीय परीक्षाओं में कुल 38 मामले लीक के दर्ज किए गए हैं। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित नीट -यूजी, यूजीसी -नेट और पूर्व में कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी ) जैसी परीक्षाओं के पेपर लीक होने से राष्ट्रीय स्तर पर हाहाकार मचा है। इंटरनेट, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे सुरक्षित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करके इन परीक्षाओं के कोड और प्रश्नपत्रों को परीक्षा से चंद घंटे पहले करोड़ों रुपयों में बेचा गया।
राजस्थान और गुजरात (11-11 मामले)
राज्यों की श्रेणी में राजस्थान और गुजरात संयुक्त रूप से शीर्ष पर हैं, जहां क्रमशः 11-11 बड़े पेपर लीक के मामले आधिकारिक तौर पर सामने आए हैं। राजस्थान में पिछले सालों में शिक्षक भर्ती (आरईईटी), पुलिस कॉन्स्टेबल, पटवारी और वनरक्षक जैसी परीक्षाओं के पेपर पूरी तरह लीक हुए, जिसके कारण लाखों अभ्यर्थियों की मेहनत पर पानी फिर गया। गुजरात में भी अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (जीएसएसएसबी ) की विभिन्न क्लर्क परीक्षाओं और सरकारी बोर्ड परीक्षाओं के पेपर लगातार लीक होने के बाद सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा है।
उत्तर प्रदेश (10 मामले)
उत्तर प्रदेश में पेपर लीक के 10 मामले दर्ज किए गए हैं। हाल ही में हुई यूपी पुलिससिपाही भर्ती परीक्षा और समीक्षा अधिकारी (आर ओ /एआ्ररओ) परीक्षा के पेपर लीक ने राज्य के सुरक्षा दावों की पोल खोल दी। इसके अलावा पूर्व में यूपी-टीईटी (यूपी टीईटी , लेखपाल और जूनियर इंजीनियर जैसी परीक्षाओं के पेपर भी लीक माफियाओं के हत्थे चढ़ चुके हैं। उत्तर प्रदेश में इस रैकेट के तार अंतर-राज्यीय गिरोहों से जुड़े पाए गए हैं।
महाराष्ट्र (10 मामले)
भर्ती धांधली के मामले में महाराष्ट्र में भी 10 मामले उजागर हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग की भर्ती परीक्षा, म्हाडा (एमएचएडीए ) भर्ती और टीईटी परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर तकनीकी और भौतिक रूप से पेपर लीक होने की पुष्टि हुई थी, जिसमें कई बड़े अधिकारियों और निजी एजेंसियों को गिरफ्तार भी किया गया था।
मध्य प्रदेश (6 मामले) – मध्य प्रदेश का नाम आते ही ऐतिहासिक व्यापमं घोटाला याद आता है। हालांकि हालिया रिपोर्ट के अनुसार, नए प्रारूपों में एमपी में 6 पुख्ता मामले दर्ज हैं, जिनमें नर्सिंग कॉलेज मान्यता घोटाला, पटवारी भर्ती परीक्षा में हुई धांधली और कृषि विस्तार अधिकारी परीक्षा के पेपर लीक प्रमुख हैं। मध्य प्रदेश में परीक्षा माफिया ने तकनीकी प्रणालियों में सेंध लगाने में महारत हासिल कर ली है।
साल 2026 में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा एक बार फिर बड़े पैमाने पर पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं के गंभीर संकट से घिरी है। यह विवाद 2024 के नीट घोटाले की याद दिलाता है, लेकिन इस बार सरकार और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को अभूतपूर्व कड़े कदम उठाने पड़े हैं।
यूपीए सरकार के दौरान भी लीक होते रहे हैं पर्चे
आज राहुल गांधी पीएम आवास के बाहर धरने पर जरूर बैठे हैं मगर यह भी ध्यान रखना होगा कि जब यूपीए की सरकार थी, तब भी परचे लीक हो रहे थे। 2014 से पहले केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार (2004-2014) के कार्यकाल के दौरान हुए पेपर लीक हुए । 1. 2004 से 2014 के बीच हुए मुख्य पेपर लीक) इस कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय स्तर की कई बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे, जिनकी वजह से परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं या भारी विवाद हुआ:
कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) – 2003/2004: यह लीक नवंबर 2003 के अंत में हुआ था (जब वाजपेयी सरकार जाने वाली थी), लेकिन इसका पूरा असर और जांच 2004 में कांग्रेस सरकार आने के बाद भी चलती रही। इसमें प्रसिद्ध ‘रंजीत डॉन’ का नाम सामने आया था।
एआईजेईई (ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एन्ट्रेंस एक्जामिनेशन) – 2011 : 1 मई 2011 को होने वाली इस देशव्यापी इंजीनियरिंग परीक्षा का पेपर लीक हो गया था। पेपर यूपी और अन्य राज्यों में ₹6 लाख तक में बेचा जा रहा था। इस कारण परीक्षा को उसी दिन कुछ घंटों के लिए टालना पड़ा और दोपहर बाद दूसरी पाली में बैकअप पेपर से परीक्षा कराई गई।
एआईपीएमटी (ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट) – 2012: इस परीक्षा के दौरान भी अनियमितताओं और पेपर लीक के प्रयास की खबरें आईं, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कड़े सवाल उठे थे।
एम्स पीजी एन्ट्रेंस एक्जाम – 2012: एम्स की पोस्ट ग्रेजुएट प्रवेश परीक्षा में एक बड़ा लीक और हाई-टेक नकल का रैकेट पकड़ा गया था, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने केस दर्ज कर कई डॉक्टरों और बिचौलियों को गिरफ्तार किया था।
राष्ट्रीय परीक्षाओं के अलावा राज्यों की कांग्रेस सरकारों में भी कुछ बड़े लीक हुए। उदाहरण के लिए, राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार (2008-2013) के समय और हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के समय कुछ स्थानीय शिक्षक और पुलिस भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे।
उस दौर में ‘शिक्षा मंत्रालय’ को मानव संसाधन विकास मंत्रालय कहा जाता था। 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस सरकार में दो प्रमुख शिक्षा मंत्री रहे: 1. अर्जुन सिंह: मई 2004 से मई 2009 तक (यूपीए -1 में), 2. कपिल सिब्बल: मई 2009 से अक्टूबर 2012 तक (जब 2011 में एआईईईई का बड़ा पेपर लीक हुआ, तब कपिल सिब्बल ही देश के शिक्षा मंत्री थे)। 3. एम. एम. पल्लम राजू: अक्टूबर 2012 से मई 2014 तक।
क्या किसी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ था?
नहीं, इस दौरान पेपर लीक की वजह से किसी भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ था।
जब 2011 में एआईजेईई का पेपर लीक हुआ, तब शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने परीक्षा के सिस्टम को ऑनलाइन करने यानी कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट (सीबीटी) और सीबीएसई (सीबीएसई) के ढांचे में सुधार करने की बात कही थी, लेकिन नैतिक या राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा नहीं दिया गया था। भारतीय इतिहास में पेपर लीक को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का कोई उदाहरण नहीं मिलता है। मंत्रियों का हटना या बदलना आमतौर पर कैबिनेट या कार्यकाल खत्म होने पर ही हुआ।
परीक्षा का आयोजन और लीक का खुलासा
3 मई 2026 : देश भर में 22.7 लाख से अधिक चिकित्सा अभ्यर्थियों के लिए नीट -यूजी परीक्षा का आयोजन किया गया था। परीक्षा संपन्न होने के तुरंत बाद सोशल मीडिया, विशेषकर व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर एक तथाकथित ‘गेस पेपर’ वायरल हुआ। जांच एजेंसियों (जैसे राजस्थान एसओजी ) की शुरुआती पड़ताल में सामने आया कि इस वायरल पीडीएफ PDF के 180 में से 120 सवाल हूबहू मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र से मेल खा रहे थे। जांच रिपोर्ट के मुताबिक, परीक्षा से करीब 42 से 48 घंटे पहले ही लीक प्रश्नपत्र को सीकर (राजस्थान), नासिक (महाराष्ट्र) और अन्य कोचिंग नेटवर्क्स में 10 लाख से 50 लाख रुपये प्रति छात्र तक में बेचा गया था।
सजा का प्रावधान तो है
नीट और यूजीसी – नेट परीक्षाओं में कथित अनियमितता को लेकर खड़े हुए विवाद के बीच केंद्र सरकार ने भविष्य में पेपर लीक की घटनाओं को रोकने के लिए लेकर बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने पेपर लीक की घटनाओं को रोकने के लिए एक नया और सख्त कानून लागू किया है। एंटी-पेपर लीक कानून यानी पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 लागू हो गया है। इस कानून के तहत पेपर लीक करने पर 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह कानून देश में शिक्षा प्रणाली की शुचिता और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। फरवरी 2024 में संसद से यह कानून पारित हो गया था, जो 21 जून 2024 से लागू हो चुका है।
58 हजार करोड़ का कोचिंग कारोबार मगर जवाबदेही कहां है?
भारत के ट्यूशन रिपब्लिक ने पड़ोस के ट्यूटर्स के साथ-साथ, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कोचिंग क्लासेस ने डिजिटल दुनिया में अपना जाल फैला लिया है। दो साल की महामारी के बाद, यह उद्योग अब पहले से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है। दरअसल यह शहरी भारत में आगे बढ़ने एक जरूरत बन गई है। नेशनल सैंपल सर्वे द्वारा 2016 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 7.1 करोड़ छात्र ट्यूशन में नामांकित हैं । शिक्षा मंत्रालय (तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय) द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति के 2015 के अनुमान के अनुसार, कोचिंग संस्थानों का वार्षिक राजस्व 24,000 करोड़ रुपये था। पुणे स्थित कंसल्टेंसी फर्म इंफिनियम ग्लोबल रिसर्च की मानें तो मौजूदा समय में भारत के कोचिंग उद्योग का बाजार राजस्व 58,088 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस इंडस्ट्री के 2028 तक 1,33,955 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है। हजारों करोड़ों का कारोबार है मगर जवाबदेही तय नहीं हुई। कोचिंग सेटरों के नियमन की व्यवस्था नहीं है। फर्जी विज्ञापनों के मामले में कई बार अदालत की फटकार पड़ी मगर कोई असर नहीं है । अव्यवस्था के कारण कई हादसे हो चुके हैं मगर किसी का कुछ नहीं बिगड़ा ।
नीट -यूजी 2026 पेपर लीक मामले की जांच में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बड़ा खुलासा किया है। एजेंसी ने स्पेशल कोर्ट को बताया कि महाराष्ट्र के लातूर स्थित एक कोचिंग सेंटर के संचालक ने परीक्षा से पहले केमिस्ट्री के सवाल हासिल करने के लिए कथित तौर पर 5 लाख रुपये दिए थे । सीबीआई का दावा है कि यह पूरा मामला सुनियोजित साजिश का हिस्सा था और इसमें कई लोग शामिल थे। प्रयागराज में लेखपाल भर्ती परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रतियोगी छात्रों के विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च के बाद तीन बड़े कोचिंग संस्थानों पर प्रशासन की सख्त कार्रवाई से हड़कंप मचा हुआ है। आरोप है कि प्रयागराज के तीन कोचिंग संस्थानों, एग्जामपुर, सुपर क्लाइमैक्स एकेडमी और टारगेट ऑन कोचिंग ने इस आंदोलन का समर्थन किया था। इसके बाद 31 मई को प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) ने कार्रवाई करते हुए इन तीनों कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया ।
सरकारी साजिश का अंदेशा
सार्वजनिक क्षेत्र की सर्वाधिक रोजगारमूलक इकाई भारतीय रेल है। लीकेज के चलन के साथ –साथ आर.आर.बी. की तमाम इकाईयां लुप्त हो गयीं । बची-खुची सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती प्रक्रिया बंद हो गयी । लोग अनुबंध पर लिए जाने लगे । दिखावे के लिए परीक्षाएं जरूर ली गयीं लेकिन कोचिंग सेंटरों से हाथ मिलाकर अथवा आउटसोर्सिंग एजेंसियों को परीक्षा नियामक बनाकर लीकेज को बढ़ावा दिया गया । सरकारी बाबू खुश,नाम की परीक्षा भी हुई और पैसों का वारा – न्यारा भी हुआ और नौकरी मिली सिफर । इसे कुछ लोग सरकारी साजिश का ही अंग मान रहे हैं।




