Thursday, March 19, 2026
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नवरात्रि में व्रत रखने के पीछे है गहरी आयुर्वेदिक सोच

नवरात्रि में व्रत रखना सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आयुर्वेदिक सोच भी छिपी हुई है। अक्सर लोग इसे सिर्फ पूजा-पाठ या आस्था से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अगर आयुर्वेद की नजर से समझें तो यह शरीर को अंदर से रीसेट करने का एक बेहतरीन मौका होता है। दरअसल, नवरात्रि ऐसे वक्त पर आती है, जब मौसम बदल रहा होता है। इस बदलाव का असर सीधे हमारे शरीर पर पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस दौरान शरीर में वात और पित्त दोष असंतुलित हो सकते हैं, जिससे पाचन कमजोर होता है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जब हम नवरात्रि में व्रत रखते हैं और हल्का, सात्विक भोजन जैसे फल, कुट्टू, सिंघाड़ा, दही या साबूदाना खाते हैं, तो हमारा पाचन तंत्र थोड़ा आराम पाता है। रोज-रोज भारी, तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से जो दबाव बनता है, वह कम हो जाता है। इससे शरीर को खुद को ठीक करने का समय मिलता है। आयुर्वेद में पाचन शक्ति (अग्नि) को बहुत अहम माना गया है। अगर अग्नि मजबूत है, तो शरीर स्वस्थ रहता है। व्रत रखने से यह अग्नि दोबारा सक्रिय होती है और शरीर में जमा टॉक्सिन्स बाहर निकलने लगते हैं। यही कारण है कि व्रत के दौरान लोग खुद को हल्का और ज्यादा ऊर्जावान महसूस करते हैं।
सिर्फ शरीर ही नहीं, नवरात्रि का व्रत मन पर भी असर डालता है। इस दौरान लोग ध्यान, पूजा और संयम का पालन करते हैं, जिससे मानसिक शांति मिलती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह एक तरह का मेंटल डिटॉक्स की तरह काम करता है, जहां आप खुद को थोड़ा स्लो डाउन करके अंदर से संतुलित करते हैं।
एक और दिलचस्प बात यह है कि नवरात्रि में खाए जाने वाले ज्यादातर फूड आइटम्स सात्विक होते हैं, जो न सिर्फ पचने में आसान होते हैं बल्कि शरीर को जरूरी पोषण भी देते हैं। ये फूड्स शरीर को हल्का रखते हैं और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे मौसमी बीमारियों से बचाव होता है।

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