सुषमा त्रिपाठी
कोलकाता । क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने कोई सामान मंगाया ही नहीं मगर किसी ने आपके साथ ऑर्डर शेयर कर सामान मंगवाया। आपको वह ऑर्डर दिख रहा है और ई कॉमर्स पोर्टल लगातार आपको फोन कर रहा है। आप कह रहे हैं कि आपने सामान मंगाया नहीं और वह आप पर दबाव डाले जा रहा है कि आप खुद ही ऑर्डर कैंसिल कर दें। पहली बात तो यह है कि जब आपने सामान मंगाया ही नहीं तो आप पर ऑर्डर कैंसिल करने का दबाव बनाना ही बेतुका है। दूसरी बात दबाव डालकर ऑर्डर कैंसिल करना सीधे -सीधे उपभोक्ता अधिकारों का हनन है। यह डेटा सुरक्षा से जुड़ा मामला है और सीधे साइबर अपराधियों को न्योता देता है। कम्पनियों की वेबसाइट पर खराब सामान मिलना तो आम बात है मगर इस समस्या पर बात कम ही होती है।
अक्सर हम अमेजन, बिग बास्केट, फ्लिपकार्ट, मीशो जैसी कम्पनियों से खरीददारी करते हैं मगर कोई भी कम्पनी डेटा सुरक्षा का आश्वासन नहीं देती। ऐसा ही ताजा अनुभव फ्लिपकार्ट के साथ हुआ और यह एक तरह से मानसिक प्रताड़ना और असुरक्षा का मामला है। सवाल यह है कि कोई भी ई कॉमर्स कम्पनी किसी भी तरीके से किसी भी ग्राहक का नम्बर किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ साझा कैसे कर सकती है। ग्राहक की जानकारी और अनुमति के बगैर कोई अनजान और अपरिचित व्यक्ति किसी ई कॉमर्स कम्पनी की आधिकारिक वेबसाइट पर कैसे किसी और की प्रोफाइल में झांक सकता है? जो ई कॉमर्स कम्पनियां हमारे जरिए लाखों – करोड़ों का कारोबार करके अपनी झोली भर रही है, क्या हमारे डेटा को सुरक्षित करना उनकी जिम्मेदारी नहीं है। साइबर अपराधियों और हैकरों पर बहुत बात होती है मगर इन कम्पनियों पर लगाम कौन कसेगा जो कि साइबर अपराधों का बड़ा माध्यम बनती जा रही हैं। क्लाउडएसईके की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है, और अनुमान है कि 2025 तक इससे होने वाला नुकसान चौंका देने वाला ₹20,000 करोड़ तक पहुंच चुका है। इसका मुख्य कारण क्या है? ब्रांड का दुरुपयोग और फर्जी डोमेन, जिनसे अकेले व्यवसायों और उपभोक्ताओं को ₹9,000 करोड़ का नुकसान होने की आशंका हुआ। सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार का सम्मान करता है तो सरकार इसके उल्लंघन पर सख्त क्यों नहीं है ? जरूरी है कि सभी ई कॉमर्स कम्पनियों के लिए ग्राहकों की डेटा सुरक्षा के लिए वेबसाइट को जिम्मेदार ठहराया जाए और ग्राहकों को होने वाली असुविधाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। कहने को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 सोशल मीडिया मध्यस्थों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मार्केटप्लेस की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। यह एआई सहित प्रौद्योगिकियों के उभरते दुरुपयोग को संबोधित करता है और प्लेटफार्मों से गैर-कानूनी सामग्री को हटाने का आदेश देता है। सवाल फिर भी यही है कि आम आदमी इन पेचीदा स्थितियों से कैसे निपटे, खासकर तब जब आपकी आधी से अधिक आबादी साइबर अपराधों और तकनीक को समझने में सक्षम ही नहीं है। 86 प्रतिशत से अधिक घर अब इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। सरकार कहती है कि भारत में साइबर सुरक्षा की घटनाएं वर्ष 2022 में 10.29 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 22.68 लाख हो गई मगर लगाम तो कहीं और लगाने की जरूरत है।




