कोलकाता । अर्चना संस्था द्वारा स्वरचित कविताएं, गीत और विषय परक विभिन्न प्रस्तुतियां सुनाई गईं जो रचनाकारों की सृजनात्मकता को दर्शाती है। हिंदी भाषा दिवस पर हुई इस काव्य गोष्ठी में राजस्थानी भाषा में भी रचना सुनने को मिली जो भाषा और देशभक्ति को समर्पित है।
उषा श्राफ ने आनलाइन सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया और गोष्ठी का संयोजन और संचालक इंदू चांडक ने किया।कवि चिराग चतुर्वेदी (अयोध्या), डॉ वसुंधरा मिश्र (कोलकाता),भारती मेहता, हिम्मत चौरड़िया (अहमदाबाद),सुशीला चनानी, मृदुला कोठारी,हिम्मत चौरड़िया , संगीता चौधरी कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाई।
हिम्मत चौरड़िया प्रज्ञा ने हिंदी भाषा के लिए अपने विचार व्यक्त करते हुए बावन वर्ण विधा-गीत में इन पंक्तियों के द्वारा अपनी रचना की प्रस्तुति दी।
स्वर व्यंजन का ज्ञान सीख लें, आओ सारे।/तेरह स्वर हैं बड़े निराले, लगते प्यारे।। और गीतिका छंद की बानगी सुनाई।हिन्दी भाषा की यह पुकार है।/करना बढ़-चढ़ कर नित प्रचार है। इंदू चांडक ने श्राद्धपक्ष की महिमा बताते हुए अपनी रचना सुनाई।
पूर्वजों की पुण्य स्मृति,मन में दीप जलाती है।
आलोकित कर हृदय हमारा, जीने की राह दिखाती है।।
और गीत भी सुनाया-कहाँ चली,कहाँ चली/ ये जिन्दगी कहाँ चली।जो जीवन के दर्शन को व्यक्त करने वाली थी।
डॉ वसुंधरा मिश्र ने लम्हे शीर्षक से अपनी रचना कुछ इस तरह अपने अंदाज में सुनाई जो श्रोताओं के हृदय को छू गई,/ उनकी पंक्तियां –काश उन लम्हों को पकड़ पाती जिसने बनाया यह जीवन रंगीन यह इंद्रधनुषी लहरें समंदर की भोलापन इन श्वेत शिखरों विहरते स्वच्छंद उन्मुक्त पक्षी को… बांध लेती हूँ कसकर कहीं कुछ खो ना जाए /रंग बदरंग ना हो जाए/कुछ खो ना जाए। डॉ मिश्र की पहचान शीर्षक की कविता में वे कहती हैं –अनजानों के बीच पहचान ढूंढने आई हूँ सदियों से कोई निशान ढूंढने आई हूँ /जाने कितने नगर छान लिए /सड़कों, गलियों के पथ छोड़ें/ फिर भी, क्यों लगता यह शहर अंजाना -सा।
भारती मेहता ने अहमदाबाद से अपनी रचना सुनाई ।जो जीवन की सच्चाई को दर्शाती है -ज़िन्दगी चरवाहा बन
एक अदृश्य लाठी द्वारा हमें हाँक रही / चल इधर..चलो उधर !* कुछ समेट लिया , कुछ बिखेर दिया/ कुछ उलीच लिया, कुछ अर्घ्य दिया/ गुणीजनों के गुणों को अंजुरी में भर शिक्षा का अर्घ्य दिया ।
सन् 1952 में स्थापित महानगर की सबसे पुरानी संस्थानों में अर्चना ने सन् 1983 से कवि बंधुओं को एक सशक्त मंच प्रदान कर रखा है।प्रत्येक महीने में एक काव्य गोष्ठी आयोजित होती है जिसमें कवि कवित्रियां सम्मिलित हो स्वरचित कविताओं का पाठ करते हैं और सभी एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।”कुछ की तो प्रवहमान, मधु वर्षिणी है
कुछ का आकाश अपना अपना है /कुछ कल उड़ेंगे कुछ उड़ रहे आज /यों उनकी उड़ान अपनी अपनी है ”
लेखक कवि डॉ वासुदेव पोद्दार , साहित्य महोपाध्याय कवि नथमल केडिया, महाकवि गुलाब खंडेलवाल,कवि और साहित्यकार श्याम सुंदर बगड़िया जैसे महान साहित्यकार और कवि इस संस्था के पुरोधा रहे हैं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि स्वरचित कविताएं इस संस्था का वैशिष्ट्य है जो व्यक्ति की कल्पना शक्ति और अनुभूति को हवा देती है।
उषा श्राफ ने बारिश के मौसम पर आधारित अपनी अभिव्यक्ति रखी।पावस की नन्ही बूंदों संग/संदेश सुहाना लाया /जीवन कभी सृजन और /कभी विनाश की कहानी/कह ही जाता हैं /यही सुंदरता है। सुशीला चनानी ने विषय पर दो रचनाएं सुनाई,दिल नहीं है खिलौना / बुद्धि की गठरी बांध ओ मूढ मति।
कवयित्री संगीता चौधरी ने माहिया छंद में अपनी छोटी छोटी रचनाएं १.कहती मेरी दादी /लाखों शीश कटे /तब पाई आजादी। २.कान्हा तुम आ जाओ /बिलख रही कलियां /फिर चीर बढ़ा जाओ।३.दो आंखें पथराई /सुत धन बांँट रहे /क्या लाज नहीं आई। /४.बिन बात फिसलती है /जीभ कतरनी सी /रिश्तों पर चलती है/रचना_मेरी अभिव्यक्ति में हिंदी, /मुझे सरलता देती है।/भय,चिंता और विषाद को,/सहज ही हर लेती है।
मृदुला कोठारी ने हिंदी,राजस्थानी भाषा में कविता और गीत सुना कर अपनी भाषा के महत्व को समझाया। राष्ट्रभाषा हिंदी को करते हैं नमस्कार /वह नहीं है उपेक्षित नहीं है लाचार/और गीत काला धोला बादल आया म्हारे छोटे गांव में /पूनम बावली थिरक रैइ है/पायल बांध्या पांव में ,सुनाया।
चिराग चतुर्वेदी ने आरक्षण के बहुत सारे दोहों द्वारा अपनी बात रखी और आने वाली पीढ़ी को सीख दी।धन्यवाद दिया मृदुला कोठारी ने।




