Monday, October 19, 2026
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इन 7 जगहों पर नहीं जलाया जाता रावण का पुतला

भारत में दशहरा यानी विजयदशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान राम की विजय की स्मृति में देश के अनेक हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। हालांकि, भारत की सांस्कृतिक विविधता ऐसी भी परंपराओं को संजोए हुए है, जहां दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। इन स्थानों पर रावण से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं, पारिवारिक संबंधों की कथाएं और धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और महाराष्ट्र तक ऐसे कई स्थान हैं, जहां रावण को अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। आइए जानते हैं देश के सात ऐसे स्थानों के बारे में। 1. बिसरख, उत्तर प्रदेश: रावण का ननिहाल मानी जाती है यह जगह
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्थित बिसरख गांव रावण से जुड़ी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसे रावण का ननिहाल माना जाता है। यहां रावण से संबंधित मंदिर और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। गांव के कुछ लोग रावण को विद्वान और भगवान शिव का भक्त मानते हैं। इसी आस्था के कारण यहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने की परंपरा अन्य स्थानों से अलग मानी जाती है। बिसरख की पहचान देश के उन चुनिंदा स्थानों में होती है, जहां रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को विशेष महत्व दिया जाता है।
2. मंदसौर, मध्य प्रदेश: रावण का ससुराल मानी जाती है यह नगरी
मध्य प्रदेश का मंदसौर रावण से जुड़ी एक अलग मान्यता के कारण प्रसिद्ध है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, मंदोदरी का संबंध इसी क्षेत्र से था। इसी वजह से मंदसौर को रावण का ससुराल भी कहा जाता है। यहां रावण की पूजा करने वाले लोग उसे केवल रामायण के युद्ध में पराजित हुए राजा के रूप में नहीं देखते, बल्कि मंदोदरी से उसके संबंध के कारण भी सम्मान देते हैं। स्थानीय परंपराओं में रावण के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाई देता है। हालांकि, इस मान्यता से जुड़ी कथाओं को स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

3. रावनग्राम, मध्य प्रदेश: दशहरे पर होती है रावण की पूजा

मध्य प्रदेश के रावनग्राम में भी रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। यहां दशहरे के अवसर पर रावण की पूजा किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोगों की आस्था में रावण का विशेष स्थान है और उसके पुतले के दहन के बजाय पूजा को महत्व दिया जाता है। यह परंपरा दर्शाती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण से जुड़े पात्रों को लेकर अलग-अलग लोकविश्वास विकसित हुए हैं। इन परंपराओं को समझने के लिए स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं को जानना जरूरी है।

4. जोधपुर, राजस्थान: रावण से जुड़ी है स्थानीय समुदायों की आस्था

राजस्थान के जोधपुर में भी रावण से जुड़ी धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। यहां कुछ समुदाय स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं और उसे अपना पूर्वज मानकर सम्मान देते हैं। इसी कारण इन समुदायों के बीच दशहरे पर रावण की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। जोधपुर में रावण से जुड़ी मान्यताएं राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता का एक उदाहरण हैं। यहां यह परंपरा इस बात को भी सामने लाती है कि किसी धार्मिक या पौराणिक पात्र को लेकर अलग-अलग समुदायों की धारणाएं एक जैसी नहीं होतीं।

5. काकिनाड, आंध्र प्रदेश: रावण के साथ होती है भगवान शिव की पूजा

आंध्र प्रदेश के काकिनाड में रावण से जुड़ा मंदिर प्रसिद्ध है। रावण को रामायण में भगवान शिव का परम भक्त बताया गया है और इसी रूप को यहां की कुछ धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व दिया जाता है। यहां रावण के साथ भगवान शिव की पूजा किए जाने का उल्लेख मिलता है। रावण की शिवभक्ति, उसकी विद्वत्ता और धार्मिक साधना से जुड़ी कथाएं इस परंपरा का आधार मानी जाती हैं। यह स्थान उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जहां दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले के दहन के बजाय उससे जुड़ी आस्था को महत्व दिया जाता है।

6. कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश: रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यता

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में भी रावण की पूजा से संबंधित लोकमान्यताओं का उल्लेख मिलता है। प्रचलित कथा के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी मान्यता के कारण कुछ स्थानीय लोगों के बीच रावण के प्रति श्रद्धा का भाव है। कहा जाता है कि यहां कुछ लोग रावण का पुतला जलाने से बचते हैं और उसकी पूजा को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, इस परंपरा का स्वरूप अलग-अलग स्थानों और समुदायों में भिन्न हो सकता है। इसलिए इसे पूरे कांगड़ा जिले की एक समान परंपरा नहीं माना जाना चाहिए।

7. गढ़चिरौली, महाराष्ट्र: आदिवासी समुदायों में रावण से जुड़ी मान्यताएं

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में कुछ आदिवासी समुदायों के बीच रावण और उसके पुत्र से जुड़ी अलग धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन समुदायों की परंपराओं में रावण को सम्मान देने और उसकी पूजा करने का भाव दिखाई देता है। इसी वजह से कुछ स्थानों पर दशहरे के दौरान रावण के पुतले का दहन करने के बजाय पूजा की जाती है। यह परंपरा भारत के आदिवासी समाजों की सांस्कृतिक विविधता और उनकी अपनी धार्मिक मान्यताओं को सामने लाती है। हालांकि, सभी आदिवासी समुदायों की मान्यताएं एक जैसी नहीं हैं।

दशहरे की परंपराएं बताती हैं भारत की सांस्कृतिक विविधता

दशहरा देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। अधिकांश स्थानों पर रावण दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जबकि कुछ क्षेत्रों में रावण से जुड़ी स्थानीय कथाओं, उसकी विद्वत्ता, शिवभक्ति या पारिवारिक संबंधों के कारण उसे सम्मान दिया जाता है। बिसरख, मंदसौर, जोधपुर और अन्य स्थानों की ये परंपराएं बताती हैं कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत कितनी विविध है। इन मान्यताओं को समझते समय स्थानीय इतिहास, लोककथाओं और समुदायों की आस्था के बीच अंतर को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

(साभार – खास खबर)

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