सिंगल मदर और तलाकशुदा के टैग को धोकर अपनी पहचान बना रही है शिल्पी

वह पत्रकार है मगर आम महिला पत्रकारों के बीच रहकर भी काफी अलग। जब आप शिल्पी से मिलते हैं तो अनायास ही उसकी हँसी आपका ध्यान खींच लेती है। वह खुश रहना चाहती है और हमेशा खुश रहती है क्योंकि उसे खुश रहना और जिंदगी को जीना आता है। वह कभी किसी की सहानुभूति नहीं माँगती, सहायता भी नहीं माँगती मगर सहयोग भी बहुत कम माँगती है। शिल्पी दूसरों की तरह होकर भी काफी अलग है क्योंकि वह एक माँ है, सिंगल मदर। शादी के साल भर बाद ही तलाक हो गया और हमारे आस – पास के नुमाइंदे औऱ शुभचिंतक (जिनमें महिलाएं भी जरूर होंगी) एक तलाकशुदा औरत को अछूत समझते हैं और ताने सुनाते हैं, शिल्पी के साथ भी हुआ।

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वह पूर्व मिदनापुर के छोटे से गाँव में पली – बढ़ी थी और जाहिर सी बात है कि उसने ताने भी सुने मगर वह कमजोर नहीं थी क्योंकि उसे जीना था, उसे कुछ करना था। 4 साल के बच्चे को अपने माता – पिता की गोद में छोड़कर वह महानगर कोलकाता की ओर निकल पड़ी, नौकरी तलाशने के लिए मगर गँवई संस्कृति में पली शिल्पी के लिए नौकरी पाना इतना आसान नहीं था। कुछ दिनों तक छोटी – मोटी नौकरी की और वापस गाँव आ गयी मगर कुछ करने का जुनून कुछ ऐसा था कि वह शिल्पी को वापस महानगर ले आया।

उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की और पत्रकार बनी मगर सिंगल मदर का टैग हो समाज एक अलग ही नजर से देखता है। ताने और अपमान दोनों शिल्पी को सहने पड़े मगर अब उसे हारना नहीं था, लोगों के मुँह बंद करने थे। शिल्पी कहती है कि तलाकशुदा औरत और सिंगल मदर को समाज एक अलग ही नजर से देखता है। बहुत सारी गंदी – गंदी बातें मुझे सुननी पड़ी मगर जो अपमान मुझे मिला, उसे मैंने मकसद बनाया कि अब मुझे जवाब देना है। मीडिया में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उसका साथ दिया। शिल्पी की लड़ाई सिर्फ उसकी लड़ाई नहीं थी, उसे अपने बच्चे को एक अच्छी परवरिश और एक अच्छा भविष्य देने के लिए आगे बढ़ना था। शिल्पी के माता – पिता और भाइयों ने भी उसका साथ दिया।

शिल्पी कई चैनलों में काम कर चुकी है और अपराध जैसे क्षेत्र की पत्रकारिता पर भी उसकी पकड़ है जिसे सराहा भी गया है और अब शिल्पी ने नयी उड़ान भरी है अपने बुटिक के साथ। शोरूम खोलने के लिए पैसे नहीं हैं इसलिए वह फिलहाल घर से ही काम कर रही है। अपने बेटे अस्मित के नाम पर अस्मित गारमेंट्स शुरु किया है और माँग होने पर शिल्पी के अनुसार वह सारी दुकान उठाकर ले जाती है मगर आज वह अपने बेटे के साथ काफी खुश है। शिल्पी के साहस और जज्बे को अपराजिता का सलाम।

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