साहित्यिकी’ की मासिक गोष्ठी अमृतलाल नागर पर चर्चा

महानगर की ‘साहित्यिकी’ संस्था के तत्वावधान में बुधवार दिनांक २२ मार्च १९१७ को संगोष्ठी का आयोजन किया गया । संस्था की वरिष्ठ सदस्या रेनू गौरिसरिया ने डा. धर्मवीर और ‘साहित्यिकी’ की सदस्या मधुबाला रोहतगी को मरणोपरांत श्रद्धांजलि देते हुए पद्माकर की पंक्तियों से कार्यक्रम का प्रारंभ किया । किस्सागोई में माहिर अमृतलाल नागर की जन्मशत वार्षिकी उत्सव पर केन्द्रित इस संगोष्ठी में नुपुर जायसवाल ने नागर जी कहानियों पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि विभिन्न विषयों पर लिखी उनकी कहानियों को एक सूत्र जोड़ता है और वह है –उनकी शैली में किस्स्गोई । जनप्रियता और रोचकता से ओतप्रोत नाटकीय मोड़ पर ख़त्म होने वाली उनकी कहानियाँ पाठकों के ह्रदय तक पहुँचती हैं । यही उनकी सबसे बड़ी सार्थकता है ।

पूनम पाठक ने नागर जी के हास्यव्यंग्य रचना संग्रह ‘कृपया दाएँ चलिए’ से उद्धृत रचना ‘जब बात बनाये न बनी’ का भावपूर्ण जीवंत पाठ किया । प्रमुख वक्ता  प्रेम शंकर त्रिपाठी जी ने नागर जी के उपन्यासों पर शोध कार्य करते हुए उनके साथ हुई अपनी अनेक मुलाकातों और रोचक वार्तालापों का उल्लेख करते हुए श्रोताओं को आह्लादित कर दिया । उन्होंने रेखांकित किया कि आस्था के आलोक और जिजीविषा की ज्योति से नागर जी का सम्पूर्ण लेखन आलोकित है। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभावित होते हुए भी नागर जी भारतीय संस्कृति पर अटूट आस्था रखते हुए मानव मूल्यों से जुडे रहने को ही धर्म समझते थे । उनका यह स्पष्ट मानना था कि संस्कृति को संप्रदाय से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। अध्यक्षीय भाषण में किरण सेपानी ने नागर जी के सम्पूर्ण रचना संसार का उल्लेख करते हुए ‘ताई’ और ‘सुहाग के नुपुर’ का विशिष्ट उल्लेख करते हुए ताई को हिंदी साहित्य का अविस्मर्णीय चरित्र घोषित किया । गीता दुबे ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि किसी भी साहित्यकार को उनके साहित्य के आधार पर आलोचित किया जाना चाहिए I संगोष्ठी में संस्था की अनेक सदस्याओं के अतिरिक्त गिरधर राय जी भी उपस्थित थे I कार्यक्रम का सफल संचालन सुषमा हंस ने किया।

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