विविधता और सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी है

इन दिनों हवा गर्म है, आग उगल रही है। जो सुकून चाहिए, खोता जा रहा है। नेता और धर्म की अगुआई कर रहे लोगों में गजब का उत्साह है। उत्तर प्रदेश में अचानक सख्त फैसले लिए जा रहे हैं और इन फैसलों को लेकर भी विवाद हो रहा है। हिन्दूत्व और राममंदिर के नारे तेज हो रहे हैं और सोशल मीडिया तो राष्ट्रवाद की परिभाषा समझाने में व्यस्त है। हर तरफ नफरत, डर और संशय…ये कौन से देश की तस्वीर है..पता नहीं? आखिर क्यों हम एक दूसरे की संस्कृति का सम्मान करके जीना नहीं सीख पा रहे? आखिर क्यों इस तरह के मसले हमारी गंगा – जमुनी संस्कृति पर भारी पड़ रहे हैं। ये तो सच है कि आप अगर चाहें भी तो वेदों के युग में नहीं जा सकते।

कट्टरता धर्म नहीं देखती, वह सिर्फ इन्सान पर निर्भर करती है, सोचने वाली बात यह है कि कट्टर होकर क्या आप भारत को 21वीं सदी में ले जा सकते हैं? किसी भी लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह होनी चाहिए, वैचारिक विविधता भी जरूरी है, उसकी रक्षा करना देश की संसद, न्यायपालिका और मीडिया के साथ आम आदमी की भी जिम्मेदारी है। अगर हिन्दुत्व में सहिष्णुता है तो उसे वैसा ही रहने दीजिए क्योंकि अगर आप किसी से न कहने का अधिकार छीनते हैं तो फिर आप दूसरों की तरह हो जाएंगे। वहीं व्यक्ति से विरोध होने के कारण उसका हर फैसला संदेह के दायरे में आए, यह भी सही नहीं है। कोई भी राष्ट्रवाद सामूहिक बलात्कार की धमकी देना नहीं सिखाता, अगर आप ऐसा करते हैं तो उसी देश को गाली दे रहे हैं, जिसके नाम पर आप लड़ने चले हैं। सच तो यह है कि इस देश का विकास सिर्फ हिन्दू, सिर्फ मुसलमान, सिर्फ सिख या सिर्फ ईसाई नहीं कर सकता, विकास के लिए सबको साथ चलना होगा।

नेताओं का काम राजनीति करना है मगर उनकी चाल समझना और  सौहार्द बनाए रखना ये हमारे और आपके हाथ में है। बात अगर महिलाओं की हो तो हर धर्म महिलाओं के प्रति कट्टर ही है। अब सवाल यह है कि कहीं नैतिकता के नाम पर महिलाओं को एक बार फिर पीछे तो नहीं धकेला जा रहा है? एंटी रोमियो दस्ता कहीं युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन तो नहीं करेगा? अगर दो वयस्क लोग अपनी मर्जी से घूम रहे हैं या बैठ रहे हैं तो उनको परेशान करने का अधिकार आपको नहीं है।  छेड़छाड़ करने वालों और प्रेम करने वालों में अन्तर करना जरूरी है क्योंकि कई बार परिवार इस तरह के मामलों में अपने बच्चों के पीछे पड़ जाते हैं क्योंकि उनका रिश्ता उनको स्वीकार नहीं होता और ऐसे में पुलिस का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे ही जैसे रिजवानुर मामले में प्रियंका के पिता ने किया था। परिवार के लिए अहंकार और जिद का मामला के साथ रुतबे का मामला भी हो सकता है।

सख्ती और अनुशासन एक सीमा तक ही सही हैं मगर आप इसे थोपना चाहेंगे तो यह कहीं न कहीं आपकी खीझ है। सोशल मीडिया पर जिस तरह आमने – सामने की हिंसक लड़ाई हो रही है, वह पूरे विचार की गरिमा को क्षति पहुँचा रही है। नरेन्द्र मोदी और फिर योगी की जीत बहुतों के गले नहीं उतर रही इसलिए हर फैसले को गलत रंग देने की प्रवृत्ति दिखने लगी है। ऐसा नहीं होना चाहिए मगर सीएम योगी को भी समझना होगा कि बहुमत कभी मनमानी का अधिकार नहीं देता और वे किसी विशेष सम्प्रदाय के नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के हर व्यक्ति के मुख्यमंत्री हैं। कमजोर से कमजोर तबके की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी ही है फिर वह किसी धर्म या समुदाय को ही मानता क्यों न हो। समय आ गया है कि योगी अपनी कट्टर छवि से ऊपर उठकर काम करें।

प्रशासनिक और सियासी तौर पर अगर उनको लम्बी पारी खेलनी है तो उनको सबको साथ लेकर चलना सीखना होगा और वह कट्टरता से कभी नहीं हो सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि राम मंदिर मसले पर सुप्रीम कोर्ट का संयम दिख रहा है इसलिए सुनवाई में कोई जल्दबाजी नहीं है। राम मंदिर और तीन तलाक के मामला, दोनों ही संवेदनशील हैं। न तलाक तो खत्म होना चाहिए मगर राममंदिर का समाधान ऐसा हो जो हमारी गंगा – जमुनी संस्कृति को और व्यापक करे। हमारी उम्मीद तो यही है, फैसला तो अदालत को करना है मगर इस देश में विविधता और सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी है जो भारतीय होने के नाते हमें निभानी पड़ेगी। नवरात्रि और रामनवमी के साथ चैती छठ, पोएला बैशाख और बैसाखी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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