निःशुल्क टिफ़िन सेवा के बदले बुजुर्गों की दुआएं बटोर रहे है मुंबई के मार्क !

डी’सूजा ने अपनी ख़ुशी उन वृद्धो की मुस्कान में खोज ली है जिन्हें वे पिछले तीन सालों से मुफ्त टिफ़िन सेवा दे रहे हैं। आइये जानते हैं मार्क का ये सफ़र।

८५ वर्षीय डेल्मा एक सेवानिवृत शिक्षिका है। बोरीवली में रहने वाली इस वृद्धा के पास रहने वाला और उन्हें खाना पका कर देने वाला कोई नहीं है। फिर भी हर दोपहर ये अपने बेटे के उम्र के मार्क का स्वागत बड़ी सी मुस्कान के साथ करती है। मार्क रोज़ इनके यहाँ खाना पहुंचाते हैं।

मार्क पिछले ३ सालों से डेल्मा जैसे करीब ४० बुज़र्गों के यहाँ खाना पहुंचा रहे हैं पर आज तक इसके बदले उन्होंने इन लोगों से एक भी पैसा नहीं लिया और न आगे कभी लेने का विचार रखते हैं। मार्क के लिए इनकी दुआएं ही सब कुछ है ।

आई सी कॉलोनी में अपने बेटे और बहु के साथ रहने वाले मार्क बताते हैं, “ मेरे माता पिता अब इस दुनिया में नहीं है। मेरी सास मेरे साथ ही रहती है और हम लोग उनका ख्याल रखते हैं। एक दिन अपने ऑफिस में बैठे बैठे मेरे मन में विचार आया कि हमारे देश में कई बुज़ुर्ग होंगे जो अकेले रहते हैं। वे अपना खाना कैसे पकाते होंगे?”

 फुर्सत के क्षणों में किया गया यह मंथन मार्क के लिए एक गंभीर सवाल बन गया और इसका जवाब उन्होंने ने खुद ही बनने की ठानी। मार्क को एक मुफ्त टिफ़िन सेवा आरम्भ करने की सूझी। उन्होंने अपनी पत्नी, य्वोन्न डी’सूजा को ये बात बताई।

मार्क और य्वोंने

बिना देर किये उनकी पत्नी ने अपने पास से ५००० रुपये निकाले और कहा, “ मार्क! यह बहुत अच्छा विचार है। तुम्हे शुरू करना चाहिए।

 १४ नवम्बर २०१२ को दिवाली के दिन, मार्क ने टिफ़िन सेवा आरम्भ कर दी ।

मार्क ने अपने आस पास रहने वाले ऐसे बुजुर्गों के बारे में पता करना आरम्भ किया। उनकी पत्नी, जो आई.सी वीमेन वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष हैं, ने इसमें बहुत सहयोग किया। इस एसोसिएशन में लगभग ३०० सदस्य हैं और उन्होंने उस जगह के आस पास रहने वाले कई वृद्धों का पता दिया।

मार्क बताते हैं, “ ये ऐसे लोग हैं, जो अपने लिए खाना बनाने में असक्षम है। कोई विकलांग है तो किसी का अपने परिवार के लोगों से मतभेद है और उनका ख्याल रखने वाला कोई नहीं है।

आज करीब ४० लोग इस सेवा का लाभ उठा रहे हैं। एक दिन में मार्क करीब २०-२५ लोगों का खाना पहुंचाते हैं क्यूंकि ऐसे कई लोग है जो रोज़ खाना नहीं मंगवाते। मार्क यह खाना स्वयं ले कर जाते हैं। हर दोपहर १२:४५ से २:३० बजे तक मार्क को घर घर खाना ले जाते हुए देखा जा सकता है।

मार्क ने खाना बनाने के लिए एक रसोइये को रखा है जिसे वे हर महीने 7000 रुपये देते हैं। इसके साथ ही उन्हें हर हफ्ते सब्जी और हर 15 दिन में राशन का सामान लाना पड़ता है। इस सेवा का लाभ उठाने वाले अधिकतर लोग दिन में केवल एक बार खाना मंगवाते हैं जिसे वे रात तक चला लेते हैं। मार्क सोमवार से शुक्रवार तक शाकाहारी भोजन देते हैं जैसे दाल, रोटी, चावल और सब्जी। और सप्ताह के अंत में, जिन लोगों को चाहिए, उन्हें मांसाहारी भोजन जैसे चिकन करी, बिरयानी आदि दिया जाता है। इस दिन टिफ़िन में फल और आइसक्रीम का भी प्रबंध रहता है।

मार्क कहते हैं कि इस काम में उन्हें किसी से कोई भी आर्थिक मदद की ज़रूरत नहीं है। उनका खुद का ‘एस्टेट एजेंसी’ का काम है जहाँ ये रोज़ सुबह 8 से दोपहर के 12 बजे तक रहते हैं। इसके बाद करीब 3 बजे तक वे लोगो को खाना पहुंचा कर वापस ऑफिस चले जाते हैं जहाँ वे रात के 7 बजे तक बैठते है।

वे कहते हैं, “ मैं काम करते रहना चाहता हूँ। मैंने रिटायर होने के बारे में अभी तक नहीं सोचा है ।

 मार्क से यह पूछने पर कि उनको यह सब करने का प्रोत्साहन कहाँ से मिलता है, वे उत्साहित हो कर बताते हैं, “ यह सब आत्म संतुष्टि की बात है। जब मैं इन लोगों तक खाना पंहुचाता हूँ तो ये हमेशा कहते हैं- भगवान् तुम्हारा भला करे मार्क!यह सच में बहुत अच्छा लगता है। सभी मेरे लिए मेरे माता पिता के जैसे हैं ।

डी’सूजा परिवार का समाज के लिए कुछ करने का जज्बा यहीं ख़त्म नहीं होता। य्वोन्न ने बचपन से बुजुर्गों के लिए एक घर खरीदने का सपना देखा था जिसे अब उन्होंने पूरा कर लिया है। इस दम्पति ने हाल ही में एक फ्लैट ख़रीदा है जिसमे ५ बिस्तर लगाये हैं। यहाँ पर रहने वाली महिलाएं नाम मात्र का किराया देती हैं जिससे य्वोन्न उनकी सारी ज़रूरतों का सामान उन तक पहुंचती है जैसे खाना, दवाइयां आदि। इन लोगों ने यहाँ के लिए एक केयर टेकर को भी रखा है जो दिन भर यहाँ रह कर इनकी देखभाल करता है।

मार्क का अगला सपना एक ऐसी जगह बनाना है जहाँ कैंसर के आखिरी स्टेज से जूझ रहे पीड़ितों की देखभाल की जा सके ।

आज डेल्मा मार्क की टिफ़िन सेवा से बहुत खुश है। उन्हें कम तेल मसाले में पकाया हुआ खाना मिला रहा है । बिलकुल वैसा जैसा उनको चाहिए था ।

मार्क याद करते हैं, “ कुछ महीनों पहले डेल्मा अस्वस्थ थीं। उन्होंने शाम को मुझे फ़ोन कर के पूछा कि क्या मैं उनके लिए खिचड़ी का प्रबंध कर सकता हूँ । मैंने उस दिन अपने ऑफिस का काम छोड़ कर डेल्मा को खाना पहुँचाया ।

 अगर और भी लोग मार्क की टिफ़िन सेवा चाहते हैं तो मार्क इसे सहर्ष बढाने को तैयार है । वे मानते हैं कि सिर्फ पहला कदम उठाने की देर होती है : “ एक बार आप कदम बढ़ा लेते हैंतो  फिर सारे रास्ते खुद ही खुल जाते हैं। ”

 

(साभार – द बेटर इंडिया)

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