कल्पना झा की तीन कविताएं

kalpana di

चिरशिशु

उन पर कविताएँ नहीं लिखी जाती
उन्हें तोहफे नहीं दिए जाते
उनसे किसी बात की माफी नहीं माँगी जाती कभी
उन्हें संपत्ति का हिस्सा नहीं दिया जाता
आगंतुकों के साथ नहीं बिठाया जाता
उन्हें न्योते नहीं दिए जाते

उनके सफ़र का कोई हमसफ़र नहीं होता
उनकी कमीज में जेब नहीं होती
उनकी पतलून में पर्स नहीं रहता
उन्हें कोई रोज़गार नहीं देता
उनकी खबरें अख़बारों और टेलीविज़न पर नहीं आती
उनकी कोई मांग नहीं होती
उनके मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं होती

उन्हें कैलेंडर के पन्ने पलटने आते हैं
पर दिन गिनने नहीं आते
उन्हें सिर्फ भूख लगती है
पेट की और स्नेह की
उन्हें आकर्षित करते हैं कागजों के रंगीन चित्र
उन्हें अचरज होता है देख कर
अपने हम उम्रों को किताबों में सर घुसाये

उन्हें अपने कान नाक मुंह गले का दर्द बताना नहीं आता
उन्हें दवाइयों के नाम नहीं आते

उन्हें आता है तो सिर्फ
बारिश की बूंदों को खिड़की से हाथ निकाल कर छूना
रंगों पर लोटना
आँधियों को अपलक निहारना
अनबोले शब्दों को आँखों से पढ़ना
उन्हें आता है हाथ मिलाना
आता है दया और प्यार में फ़र्क़ करना
आता है अंतहीन प्रतीक्षा करना

उन्हें जीवन के फलसफे नहीं मालूम होते
उन्हें पता होता है तो सिर्फ अपने खाने का वक़्त
और ये
कि अतिथियों के आने पर
उन्हें घर के किस कोने में जाकर बैठ जाना है

wine-painting

घर सजा कर

घर सजा कर
खिड़कियां बंद कर देने का रिवाज़
ख़त्म करते हैं
तेज़ हवा के झोंके सजावटी गमले न गिरा दें
यह डर दफ़्न करते हैं

खोलते हैं उन खिड़कियों को
जिनसे कहीं पास की झोपड़ियों के भात की खुशबू आती है
चूल्हे का धुंआ दाखिल होता है

उन धमाकों की आवाज़ें आने देते हैं
जो आये दिन हुआ करते हैं कहीं न कहीं
कुछ क्षण के लिए दिल दहल जाने देते हैं,
आशंकित होने देते हैं मन को कभी
उन बंदूकों की आवाज़ों से
जो चलती रहती हैं हर रोज़ कहीं न कहीं

खिड़कियां बंद कर लेने से
बाहर का शोर नहीं बंद हो जाता
झिलमिलाती रौशनी और परदों के पीछे से
थोड़ा थोड़ा सच घुस जाने देते हैं भीतर

चलो थोड़ा थोड़ा डरते हैं
उससे
जो अभी तक खिड़कियों के बाहर डरा रहा है दूसरों को
और किसी भी वक़्त दरवाज़ा तोड़ कर भीतर घुस सकता है

आओ
थोड़ा सा आक्रोशित होते हैं उस पर
जिसने अब तक हमला नहीं किया हम पर
पर पैरों के नीचे की ज़मीन काँप रही है जिसके पदचाप से
शायद कहीं पास ही
रौंदी जा रही है हरी घास
और उससे रिस रहा खून
थोड़ा थोड़ा बह रहा है इस ओर

आने देते हैं दूर से आ रही उन चीत्कारों को अपने पास
जज़्ब कर लेते हैं उस आर्तनाद को
पलने देते हैं गुस्सा अपने भीतर
हाथों की मुट्ठी भींच कर रखते हैं
और आँखों की नसों में खून उतर जाने देते हैं

तैयार रहते हैं उस युद्ध के लिए
जिसका एक पक्ष
किसी भी वक़्त हम बन सकते हैं

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और मुस्कुराती है मोनालिसा !

यहाँ मूंगफली बेचते हैं बच्चे
गाड़ियों के शीशे साफ़ करते हैं
बसों में पत्थर बजाते फ़िल्मी गाने  गाते हैं
मासूम कन्धों पर एक और मासूम देह लटकाए
बेचारगी से गाड़ियों के पीछे भागते हैं
दूध और चॉकलेट के लिए नहीं,
पेट भर खाने के लिए
और मुस्कुराती है मोनालिसा

यहाँ बच्चे कुदाल और फावड़ा चलाते हैं
ईंट पत्थर तोड़ते हैं
कूड़ा बीनते हैं और चुन लेते हैं उसमें से कुछ खेलने लायक कूड़ा
यहाँ बच्चे मंडी जाते हैं
सड़कों पर घूम घूम कर गुब्बारे बेचते हैं
और हाथों के फफोलों से रिसते पानी से
तक़दीर पर जमी मैल पोंछते हैं
और मोनालिसा मुस्कुराती है ड्राइंग रूम में

यहाँ सड़क किनारे चिथड़े बिछा
उसपर छोटे बच्चे को सुला
अपाहिज बनने का नाटक कर
भीख मांगती है औरतें
और शाम को चिल्लर समेट बस में चढ़ जाती हैं रात की रोटी सेकने
और मुस्कुराती है मोनालिसा

यहाँ घर से बेघर बूढ़े
दो चार सब्ज़ियों की दूकान लगा
बेचते हैं हर रोज़ आंसू
और मोल भाव करते लोग दो चार रुपये उनसे भी बचा लेते हैं
और मोनालिसा मुस्कुराती है ड्राइंग रूम में

यहाँ गाड़ियों के सामने आ जाते हैं पागल
अधनंगे, बालों का जट फैलाए
पहले से ही मरे हुए ये पागल
रोज़ बचते हैं मौत से
और रोज़ सुनते हैं दुर्दुराहट
पर और ज़्यादा पागल नहीं होते
नहीं हो सकते,
हंस कर, कुछ बड़बड़ा कर निकल जाते हैं
मुर्दा आँखों से ताकते हुए

और मुस्कुराती है मोनालिसा
सुन्दर घर के सुन्दर कमरे की दीवार पर।

(कवियत्री प्रख्यात रंगकर्मी तथा गायिका हैं। फिलहाल एक केन्द्रीय संस्थान में वरिष्ठ अनुवादक के रूप में कार्यरत)

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4 thoughts on “कल्पना झा की तीन कविताएं

  1. भारतेन्दु कुमार दास says:

    इन तीन अत्यंत सशक्त अलग-अलग कविताओं में बहुत कुछ साझा भी है … समाज की विसंगतियों को देखने के लिए खिड़कियों को खोलने का काम खुद कल्पना की पहली कविता करती है जिसमे मंदबुद्धि परिजनों के प्रति समाज और परिवार की गहन उपेक्षा के भाव को समाज के सामने निर्ममता से परोसा गया है … इन पीड़ाजन्य अनुभवों से मोनालिसा की मुस्कान को भी एक नया आयाम मिला दीखता है …. कल्पना झा की कवितायेँ समाज की विद्रूपताओं को दिखाता वैसा दर्पण है जिनसे हम सब शायद मुँह चुराते दीखते हैं … इसलिए ये कवितायेँ आवश्यक कवितायेँ हैं … और इनका लिखा और पढ़ा जाना जरुरी है

  2. Armaan Anand says:

    खिड़कियां बन्द करने से बाहर शोर बन्द नहीं होता

    तीनों कविताएँ अच्छी हैं। बिम्ब ताज़ा हैं। कल्पना जी को बहुत बहुत बधाई। इसी तरह लिखते रहें

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