ऐ पुरुष, जरा सोचिए और बदलिए जरा सा खुद को

रेखा श्रीवास्तव

हमारे समाज व परिवार में पुरुष का स्थान काफी महत्वपूर्ण है। एक बच्ची से लेकर वयस्क औरत तक कहीं न कहीं एक पुरुष पर ही निर्भर रहती है। समाज का सबड़े बड़ा मजबूत खंभा माना जाता है पुरुष वर्ग। महिलाओं की तरह पुरुष वर्ग में भी कुछ अच्छाइयाँ और कुछ खामियाँ हैं। अब तक महिलाओं की खामियों पर बहुत बार कलम चलायी गयी है, गोष्ठियाँ की गई हैं पर पुरुष ने न तो कभी अपने गिरेवान में झांका है और न खुद को सुधारने की कोशिश की है।

महिलाओं की तो जुर्रत ही नहीं हो सकती थी कि वह पुरुष को उंगली दिखाये और बताये कि तुम्हारे अंदर भी कमियाँ है इसलिए पुरुष वर्ग काफी आत्मविश्वास से हर कार्य करते हैं, चाहे वह समाज व परिवार के लिए सही हो या नहीं। उन्हें फैसला लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है, पर एक महिला को अगर सामान्य सी बात  भी सोचनी हो तो कई बार फैसला करती हैं और फिर उसे जाँचने की कोशिश करती रहती है कि वह फैसला सही है या नहीं।

देखा गया है कि पुरुष वर्ग चाहे वह भाई हो या पिता, दोस्त हो या पति सभी एक बार फैसला लेते हैं और उसे ही सब को मानना पड़ता है। जिस तरह स्त्री की कुछ आदतें हैं, वैसे ही पुरुषों की ही कुछ आदतें हैं। पर उनकी आदतों से घर, परिवार या समाज को कोई फर्क पड़ता है या नहीं, इसकी चिंता नहीं होती। वह बचपन से ही अपने बाहरी जीवन को बहुत खास मानता रहा है। अपने बाहरी संपर्क यानी दुनिया को ही अपनी जिंदगी, अपनी कामयाबी का हिस्सा मानता आ रहा है।

ऐसा नहीं है कि सारे पुरुष ही ऐसे होते हैं, पर अधिकांशत:। उनका सोचना है कि जिंदगी में जो रिश्ता हमें भगवान या समाज ने दिया है, यानी घरेलू रिश्ते वो तो जिंदगी भर यूँ ही चलते रहेंगे। उन्हें बनाये रखने की कोई जरूरत नहीं है। उन रिश्तों को जीवित रखने के लिए कोशिश करना बेकार है। उल्टे एक भाई घर आकर अपनी बहन पर रौब झाड़ता है। पति तो पत्नी का सर्वेसवा होता है। उसका रक्षक माना जाता है।

माँ भी अपने बेटे से डरती ही है। वही पुरुष घर में हर समय गुस्सा, एंग्री यंग मैन के रूप में हाजिर रहता है। अनुशासन के लिए कुछ हद तक जरूरी भी है, लेकिन हर समय एक ही रवैया में रहने से परिवार में दूरी आ जाती है। उनकी सोच होती है कि  बाहरी लोगों से संपर्क बनाये रखेंगे तो हमें आमदनी के अलावा एक अच्छा और परिपक्व रिश्ता मिलेगा जो हमेशा काम आयेगा। यह बात कुछ हद तक सही भी है, लेकिन पूरी तरह नहीं।

हमें चाहे घरेलू हो या बाहरी दोनों ही रिश्तों की कद्र करनी चाहिए। ठीक है कि बाहरी रिश्ते से हमें आर्थिक मदद और सामाजिक पहचान मिल सकती है, पर पारिवारिक लोगों के साथ रिश्ते बनाये रखने से हमें सकून मिलता है। अगर पारिवारिक रिश्ते को बनाये रखने में आप कोशिश करते हैं, तो माँ-पिता, भाई-बहन या पत्नी-बच्चों को एक अपनापन लगता है पर कुछ पुरुष इसे पूरी तरह से नकार देते हैं। उनका मानना है कि घर के लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियाद सुविधाओं के अलावा कुछ नहीं चाहिए। वे बच्चों को पढ़ाने के लिए आर्थिक जरूरत पूरी करना ही अपना कर्तव्य समझते  हैं। उन्हें यह नहीं समझ आता कि बच्चों के साथ कुछ पल बैठ कर खेलने, उनको पढ़ाने से, उनके भविष्य के बारे में सोच-विचार करने से परिवार मजबूत होता है। परिजन के साथ समय बिताने और उनके साथ दोस्ताना रवैया अपनाने से रिश्ते परिपक्व होते हैं।

बढ़ते बच्चों के बारे में सोचना, उनकी शादी, उनका भविष्य जैसे विषयों पर परिवार के लोगों के साथ बैठकर बात-चीत करने में बहुत से सारे पुरुष हिचकिचाहते हैं। यहाँ तक कि रिटार्यडमेंट के बाद भी अपनी आदतनानुसार वे अपनी बाहरी जिंदगी को ही भरपूर जीना चाहते हैं। हाँ, पर जैसे ही घर के बारे में कोई फैसला की बात आती है, तो  उनका सोचना है कि मैं अकेले ही परिवार का नाविक हूँ, और  मैं अकेले ही फैसला ले सकता हूँ।

अत: जब मेरा मन करेगा, जब मुझे महसूस होगा कि उनके बारे में सोचूँ तभी सोचुँगा। पर परिवार ऐसे नहीं चलता। वैसे भी परिवारनुमा आँगन तो अब छोटा ही होता जा रहा है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक पहुँच चुका है। अब तो एकल परिवार भी दम तोड़ता नजर आ रहा है। सिंगल मदर का जमाना आ गया है। पर फिर भी पुरुष वर्ग की नींद नहीं टूट रही है। अगर समय रहते पुरुष वर्ग नहीं चेता  तो हो सकता है कि जिस तरह महिलाएँ घर से निकलकर आर्थिक मजबूत हो गई है, वैसे घर के छोटे-बड़े फैसले करने का भी दायित्व ले लेगी तो इन पुरुषों का क्या होगा? समय रहते सम्भल जाएं पुरुष वर्ग नहीं तो ‘अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत!’ वाली कहावत फिट हो जायेगी।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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