आज भी संभालकर रखा है कोलकाता का गोस्वामी परिवार
-दीपंकर एडबार
कोलकाता । महालया की भोर। शहर अभी नींद में होता है। तभी रेडियो से गूंजती है गंभीर शंखध्वनि और उसके बाद सुनाई देती है बीरेंद्र कृष्ण भद्र की अमर आवाज में चंडीपाठ। बंगाली समाज में यह सिर्फ एक रेडियो कार्यक्रम की शुरुआत नहीं, बल्कि दुर्गापूजा के आगमन का सांस्कृतिक संकेत बन चुका है। लेकिन इस परिचित शंखध्वनि के पीछे भी एक पुरानी कहानी है। उत्तर कोलकाता के गिरिश पार्क स्थित गोस्वामी परिवार के पास आज भी करीब 150 वर्ष पुराना एक शंख सुरक्षित है। परिवार का दावा है कि इसी शंख को कभी आकाशवाणी के स्टूडियो ले जाया गया था और ‘महिषासुरमर्दिनी’ के शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल हुआ था।
गिरिश पार्क के 71/C, डब्ल्यू. सी. बनर्जी स्ट्रीट स्थित गोस्वामी परिवार के सदस्य चंद्रदीप गोस्वामी के अनुसार, इस शंख का संबंध उनके परिवार के प्रख्यात बांसुरीवादक गौर गोस्वामी से है। परिवार की स्मृतियों के मुताबिक, पंकज कुमार मल्लिक और बीरेंद्र कृष्ण भद्र के अनुरोध पर गौर गोस्वामी इस मंगल शंख को आकाशवाणी के स्टूडियो लेकर गए थे। इसके बाद महालया की सुबह प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के शुरुआती वातावरण में शंखध्वनि का इस्तेमाल हुआ।
हालांकि ‘महिषासुरमर्दिनी’ का इतिहास केवल एक शंख की कहानी तक सीमित नहीं है। इसका निर्माण 1930 के दशक की शुरुआत में हुआ था। बाणी कुमार ने देवी दुर्गा और महिषासुर वध की कथा पर आधारित एक संगीतमय प्रस्तुति तैयार की थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1932 में इस तरह के प्रारंभिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई और 1933 में महालया के अवसर पर इसका संशोधित रूप प्रसारित किया गया। 1936 में कार्यक्रम महालया की सुबह के प्रसारण के रूप में अधिक स्थापित हुआ और 1937 में इसका नाम ‘महिषासुरमर्दिनी’ हुआ।
इस कार्यक्रम के निर्माण में बाणी कुमार, पंकज कुमार मल्लिक और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की भूमिका निर्णायक थी। बाणी कुमार की रचना, मल्लिक का संगीत संयोजन और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज ने मिलकर ऐसा रेडियो प्रारूप तैयार किया, जो धीरे-धीरे बंगाली सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन गया।
शंखध्वनि भी इस प्रस्तुति का महज तकनीकी हिस्सा नहीं थी। शुरुआती दौर के प्रसारण से जुड़े विवरणों में कार्यक्रम की शुरुआत में शंख बजाए जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ विवरणों के अनुसार, शुरुआती वर्षों में बाणी कुमार अपने घर से शंख लेकर आते थे और मृत्युंजय बंद्योपाध्याय उसे बजाते थे। बाद के दौर में गौर गोस्वामी समेत कई कलाकार कार्यक्रम के संगीत पक्ष से जुड़े।
‘महिषासुरमर्दिनी’ का प्रारंभिक प्रसारण लाइव होता था। 1962 के बाद रिकॉर्डेड संस्करण का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसके बाद अलग-अलग समय में अलग रिकॉर्डिंग प्रसारित की गईं, लेकिन बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज और शुरुआती शंखध्वनि महालया की पहचान बनी रही।
आज रेडियो के साथ मोबाइल फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस कार्यक्रम को लाखों श्रोताओं तक पहुंचाते हैं। तकनीक बदल गई, सुनने का तरीका बदल गया, लेकिन महालया की भोर में शंखध्वनि सुनते ही बंगाली समाज के लिए दुर्गापूजा की स्मृतियां फिर जीवित हो उठती हैं।
गिरिश पार्क के उस घर में रखा करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना शंख इसी बदलते समय के बीच एक भौतिक स्मृति की तरह मौजूद है। परिवार के लिए वह पूर्वजों की विरासत है। और बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति के लिए-यह उस दौर की याद है, जब एक शंख, एक रेडियो स्टूडियो और कुछ असाधारण कलाकारों ने मिलकर महालया की सुबह को हमेशा के लिए एक अलग पहचान दे दी।




