अम्मा के जाने से बदला तमिलनाडु की राजनीति का समीकरण

  • सुषमा त्रिपाठी

भारतीय राजनीति के आकाश में जयललिता उस तारे की तरह हैं जो कहीं न कहीं अकेले आकाश में अपनी चमक बिखेर रहा है। आप इसे किसी छवि से नहीं बाँध सकते मगर आप उनको नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने राजनीति में वे तमाम दाँव खेले, जिनकी उम्मीद आप किसी नेता से करते हैं। उन्होंने रात के 2 बजे डीएमके नेता और पूर्व मुख्यमंत्री करुणानीधि को गिरफ्तार करवाया और इसे प्रतिशोध की राजनीति माना गया। जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जब भी उनका जिक्र होता है, उनके साथ उनकी साढ़े 10 हजार साड़ियाँ, 750 जूते – चप्पल और 28 किलो सोने के साथ उनकी अचल सम्पत्ति की बात भी चलती है।

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एक ऐसी नेत्री जो अकेले अपने दम पर खड़ी हुई, अपना राजनीतिक साम्राज्य बनाया और गयीं भी तो उनके पास कोई नहीं था। एमजीआर के जाने के बाद उन्होंने पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत की। खुद को एमजीआर के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में अकेले खुद को साबित किया। जानकी रामचंद्रन के परिवार और बाद में करुणानिधि के समर्थकों के हाथों जिस तरह वे अपमानित हुईं, वह अपमान उन्होंने राजनीतिक शस्त्र की तरह इस्तेमाल किया और इसे सहानुभूति में बखूूबी बदला। अगर कहा जाए कि जयललिता को स्थापित करने में इन घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है तो यह गलत नहीं होगा। अब जयललिता की मौत जिन परिस्थितियों में हुई  और  उनके आस – पास जो लोग थे, अब उन पर सवाल उठ रहे हैं और कहीं न कहीं इन सवालों में दम भी है। जयललिता की विश्वस्त मानी जानी वाली शशिकला को ये सवाल अब परेशान करने जा रहे हैं। इन तमाम सवालों का रिश्ता जयललिता की राजनीति और राजनीतिक विरासत से हैं। ये ऐसी परिस्थितियाँ हैं, जिनका लाभ हर पार्टी उठाना चाहेगी।

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हैरत की बात नहीं होगी अगर दीपा जयकुमार अगर राजनीति में कदम रखें क्योंकि शशिकला को तो वो अभी से चुनौती दे रही हैं। अब देखना यह है कि कौन सी पार्टी उनको पाने में सफल होती है। उनके हाव – भाव और उनकी छवि भी जयललिता की तरह है इसलिए तमिलनाडु की भावुक जनता अगर दीपा में जयललिता को खोज बैठे तो शशिकला के न चाहते हुए भी तमिलनाडु की नयी अम्मा बन सकती हैं। जाहिर सी बात है कि तमिलनाडु के सीएम पनीरसेल्वम जयललिता के वफादार भले ही हों मगर उनको शशिकला का खास बताया जा रहा है। एआईडीएमके में शशिकला के नाम को आगे बढ़ाया जा चुका है और अब वो पार्टी की महासचिव बनने जा रही हैं। पनीरसेल्वम को बहुत से विधायक पसंद नहीं करते इसलिए उन पर दबाव तो है ही और अगर दीपा जयकुमार जयललिता की राजननीतिक उत्तराधिकारी बनने के लिए मैदान में उतरती हैं तो पनीरसेल्वम को नापसंद करने वाले विधायक दीपा को अपना नेता मान लें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि उनको जयललिता की छवि वाला चेहरा चाहिए और वो दीपा जयकुमार में है।

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भाजपा फिलहाल शशिकला के साथ दिखायी दे रही है मगर परिस्थितियों को देखते हुए अभी कुछ भी मान लेना या निष्कर्ष निकाल लेना जल्दबाजी होगी। कहा जा सकता है कि पार्टी अभी इंतजार करो और देखो की स्थिति में है। दूसरी ओर काँग्रेस अभी डीएमके के साथ खड़ी है मगर 93 साल के करुणानिधि की पार्टी का भविष्य अभी बहुत उज्ज्वल नहीं दिखायी पड़ रहा है। शशिकला भी पार्टी की कमान सम्भाल भी लें तो भी उनके लिए आगे की राह बेहद कठिन है। पनीरसेल्वम के सामने चुनौती है कि वे खुद को बतौर मजबूत मुख्यमंत्री साबित करें। इसके लिए उनको ‘शशिकला का वफादार’ छवि से बाहर निकलना होगा मगर ये करना उनके लिए आसान नहीं होगा। सम्भव है कि ऐसे में केन्द्र की भाजपा सरकार के साथ उनके रिश्ते मजबूत हो और भाजपा राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करे। जाहिर है कि जयललिता के जाने से तमिलनाडु की राजनीति का पूरा समीकरण बदल चुका है और वह किस करवट लेगी, वह सिर्फ आने वाला वक्त बता सकता है।

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