दीपंकर एडबार
करीमपुर (नदिया) । कभी जमींदारी की शान का गवाह रहा नदिया के जामशेरपुर स्थित बागची परिवार का विशाल भवन अब जर्जर हो चुका है। दीवारों से ईंटें झड़ रही हैं, पुरानी इमारतों पर समय के निशान साफ दिखाई देते हैं। लेकिन इस घर की 356 साल पुरानी दुर्गापूजा आज भी उसी परंपरा और श्रद्धा के साथ जारी है। परिवार के अनुसार, 1711 में सृष्टिधर बागची ने इस पूजा की शुरुआत की थी और तब से इसमें कभी विराम नहीं आया।
अविभाजित बंगाल के राजशाही क्षेत्र से बागची परिवार नदिया के जामशेरपुर आया था। स्थानीय गोआला समुदाय के साथ उनके करीबी संबंधों ने इलाके में परिवार की सामाजिक और जमींदारी स्थिति मजबूत करने में भूमिका निभाई। आज भी पूजा की कई महत्वपूर्ण परंपराओं में स्थानीय गोआला और घोष समुदाय की भागीदारी बनी हुई है।
बागची परिवार की दुर्गापूजा का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। यह घर कवि और साहित्यकार जतिंद्रमोहन बागची की स्मृतियों से भी जुड़ा है। ‘काजला दीदी’ के रचयिता जतिंद्रमोहन बागची का नाम इस परिवार और जामशेरपुर से गहराई से जुड़ा रहा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में क्रांतिकारियों की आवाजाही भी इस घर में होती थी। बाघा जतिन और काजी नजरुल इस्लाम जैसी हस्तियों के यहां आने की स्मृतियां भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं।
पूजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक शैली है। यहां एकचाला प्रतिमा स्थापित की जाती है और देवी को डाक की साज से सजाया जाता है। वैष्णव रीति से पूजा होने के कारण मुख्य चार दिनों में शाकाहारी भोग दिया जाता है। लेकिन दशमी पर परंपरा बदलती है। उस दिन कचू शाक और इलीश मछली का विशेष भोग लगाया जाता है।
एक समय बागची परिवार की दुर्गापूजा का वैभव अलग ही था। परिवार के अनुसार, देवी को करीब 400 तोले सोने के आभूषणों से सजाया जाता था और चोरी की आशंका के कारण पूजा के दौरान पुलिस पहरा भी रहता था। पुराने नाटमंदिर में नाटक और जात्रा के आयोजन होते थे तथा कोलकाता से कलाकार आते थे।
आज परिवार की अगली पीढ़ी रोजगार के कारण अलग-अलग जगहों पर रहती है। लेकिन पूजा के दिनों में वे जामशेरपुर लौटते हैं। बड़े थीम पंडाल या आधुनिक सजावट के बजाय विशाल चांदनी के नीचे पारंपरिक पूजा होती है। दशमी के दिन स्थानीय घोष समुदाय को पत्तल पर भोजन कराने के बाद उन्हीं के कंधों पर प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाई जाती है।
जमींदारी का वैभव भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन बागची परिवार की दुर्गापूजा आज भी उस इतिहास को जीवित रखे हुए है।




