दीपंकर एडबार
कृष्णनगर (नदिया) । दूर के गांवों से आती ढाक की आवाज और नदी किनारे लहराते काश के फूलों के बीच दुर्गापूजा का माहौल बन चुका है। लेकिन कृष्णनगर के बागदी पाड़ा में उत्सव का आनंद लेने के बजाय कारीगर दिन-रात काम में जुटे हैं। यहां पारंपरिक ‘चाली’ तैयार करने का काम इन दिनों चरम पर है। बांस, लकड़ी, रस्सी, अखबार, रंगीन कागज, कपड़े और गोंद से कारीगर देवी प्रतिमाओं के पीछे लगने वाली सजावटी संरचनाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।
दुर्गापूजा में प्रतिमा भले ही मुख्य आकर्षण होती है, लेकिन उसके पीछे की चाली पूरी सजावट को एक अलग पहचान देती है। कृष्णनगर की चाली अपने पारंपरिक डिजाइन और बारीक हस्तकला के लिए जानी जाती है। बागदी पाड़ा के कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हैं। दुर्गापूजा के साथ कालीपूजा और जगद्धात्री पूजा के दौरान भी यहां काम का दबाव बढ़ जाता है।
कारीगरों के अनुसार, इस बार भी बड़े सामुदायिक पूजा आयोजकों के साथ-साथ घरेलू पूजा के लिए बड़ी संख्या में ऑर्डर मिले हैं। थीम आधारित पूजा के बढ़ते चलन ने चाली के डिजाइन में भी बदलाव किया है। कई पूजा समितियां अपने पंडाल की थीम के अनुरूप विशेष डिजाइन की चाली तैयार करा रही हैं।
कारीगर कार्तिक सांतरा ने कहा, “अभी काम का दबाव काफी ज्यादा है। ऑर्डर समय पर पूरा कर चाली भेजने के लिए तेजी से काम करना पड़ रहा है। आकार और डिजाइन के अनुसार एक चाली तैयार करने में करीब दो दिन लगते हैं। हर साल 300 से अधिक ऑर्डर मिलते हैं।”
कारीगरों के मुताबिक, चाली की कीमत करीब 5,000 रुपये से शुरू होती है। बारीक नक्काशी, बड़े आकार और इस्तेमाल होने वाली सामग्री के आधार पर इसकी कीमत 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। हालांकि बांस, कागज, कपड़ा, गोंद समेत कच्चे माल की कीमत बढ़ने से इस बार उत्पादन लागत भी बढ़ी है।
कारीगरों के लिए चाली बनाना केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक विरासत है। इस काम में धैर्य और बारीकी की खास जरूरत होती है। बदलते समय के साथ पूजा की सजावट में आधुनिकता और नई थीम शामिल हुई हैं, लेकिन कृष्णनगर की पारंपरिक चाली की मांग अब भी बरकरार है।
दुर्गापूजा से पहले बागदी पाड़ा में बढ़ती रफ्तार इसका प्रमाण है। जल्द ही यहां तैयार चाली नदिया जिले के अलग-अलग पूजा मंडपों में पहुंचेंगी और देवी प्रतिमाओं की खूबसूरती में एक और रंग जोड़ेंगी।




