दीपंकर एडबार
कृष्णनगर (नदिया) । साल भर कोई मछली पकड़कर परिवार चलाता है, कोई खेतों में काम करता है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी करता है। लेकिन दुर्गापूजा आते ही इनकी रोजमर्रा की जिंदगी कुछ समय के लिए बदल जाती है। सुंदरबन के दूरदराज इलाकों से हर साल मजदूरों का एक दल कृष्णनगर पहुंचता है। इनका काम है दुर्गा प्रतिमाओं को कंधे पर उठाकर पूजा मंडप तक पहुंचाना और विसर्जन के समय उन्हें घाट तक ले जाना।
पूजा से पहले ही इन लोगों की कृष्णनगर में आमद शुरू हो जाती है। कुम्हारों की कार्यशालाओं से प्रतिमाओं को वाहनों पर चढ़ाना, उन्हें रस्सियों से सुरक्षित बांधना और मंडप तक पहुंचाना-इन सभी कामों में उनकी जरूरत पड़ती है। पूजा खत्म होने के बाद विसर्जन के दौरान भी प्रतिमाओं को उठाने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर रहती है।
सुंदरबन से कृष्णनगर पहुंचना भी आसान नहीं है। पहले नाव या लॉन्च से नदी पार करनी पड़ती है। इसके बाद ट्रेन या बस से लंबा सफर तय कर वे कृष्णनगर पहुंचते हैं। परिवार से दूर रहकर कई सप्ताह तक यहीं रहना पड़ता है। हालांकि, पूजा के इन महीनों की कमाई उनके परिवारों के लिए काफी अहम होती है।
लेकिन इनके लिए यह काम केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। देवी की प्रतिमा को अपने कंधे पर उठाने के साथ उनकी आस्था भी जुड़ी हुई है। प्रतिमा उठाने वाले बिमल सरोदा पिछले 10-12 वर्षों से कृष्णनगर आ रहे हैं।
उन्होंने कहा, “पिछले 10-12 साल से कृष्णनगर आ रहा हूं। पूजा के समय अच्छा काम मिल जाता है, इसलिए हर साल आता हूं। लेकिन मां की प्रतिमा को अपने कंधे पर उठाना अलग ही खुशी देता है। कई पूजा समितियां भी हमारी मदद करती हैं।” श्यामल नस्कर भी हर साल पूजा के दौरान करीब दो महीने कृष्णनगर में रहते हैं। उन्होंने कहा, “प्रतिमा उठाना मेहनत का काम है, लेकिन हमें खुशी मिलती है। काली पूजा और जगद्धात्री पूजा के समय भी हम यहां आएंगे। कृष्णनगर की जगद्धात्री पूजा के विसर्जन में मां की प्रतिमा को कंधे पर उठाना हमारे लिए गर्व की बात है।”
दुर्गापूजा के बाद ये मजदूर फिर सुंदरबन लौट जाते हैं और अपने पुराने काम में जुट जाते हैं। लेकिन अगले साल पूजा का मौसम आते ही उनकी राह फिर कृष्णनगर की ओर मुड़ती है। उनके लिए यह सफर सिर्फ कुछ महीनों की अतिरिक्त कमाई का नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा एक सालाना सिलसिला भी है।




