दीपंकर एडबार
कालिगंज (नदिया) । जमींदारी व्यवस्था भले ही इतिहास बन चुकी हो, लेकिन कालिगंज की रॉय चौधरी परिवार की हवेली में दो सौ साल से अधिक पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा आज भी जारी है। साल के अधिकांश समय शांत रहने वाली यह पुरानी हवेली दुर्गापूजा के दौरान फिर से गुलजार हो उठती है। स्थानीय लोग इसे ‘बाबू बाड़ी’ के नाम से जानते हैं।
परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस वंश के मूल पुरुष पूर्णचंद्र गुप्तशर्मा ढाका के गोयेशपुर से आकर यहां बसे थे। उनके पुत्र हराधन गुप्तशर्मा के समय परिवार का जमींदारी से जुड़ाव शुरू हुआ। बाद में ब्रिटिश शासन की ओर से ‘रॉय चौधरी’ उपाधि मिलने के बाद वह हराधन रॉय चौधरी के नाम से जाने गए। परिवार का दावा है कि घर में दुर्गापूजा हराधन रॉय चौधरी के समय से पहले भी होती थी। हालांकि, उनके दौर में पूजा में जमींदारी परिवार की भव्यता जुड़ी। इसी समय से 17 फुट ऊंचे पारंपरिक एकचाला ढांचे पर दुर्गा प्रतिमा बनाने की परंपरा शुरू हुई। मूल ढांचा आज भी मौजूद है। हालांकि, बाद में प्रतिमा निर्माण की सुविधा के लिए इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। प्रतिमा निर्माण का काम रथयात्रा के दिन से शुरू होता है।
इस पूजा की एक खास पहचान प्रतिमा की पारंपरिक रंग-सज्जा भी है। देवी का रंग पीला और महिषासुर का रंग हरा रखा जाता है। पूजा की तैयारियों और अनुष्ठानों में परिवार की महिलाएं भी पुरुषों के साथ सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं।
पंचमी को बेलतला में घट स्थापना के साथ पूजा की औपचारिक शुरुआत होती है। षष्ठी की पूजा ठाकुरघर में होती है और शाम को बेलतला में अधिवास का आयोजन किया जाता है। सप्तमी के दिन परिवार की गृहदेवी भुवनेश्वरी को घर से दुर्गामंडप में लाया जाता है। इसके बाद प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा होती है। भुवनेश्वरी तीन दिनों तक मंडप में विराजमान रहती हैं।
गृहदेवी भुवनेश्वरी से जुड़ा भी एक पुराना इतिहास है। परिवार के सदस्यों के मुताबिक, चादरा के केदार राय की गृहदेवी भुवनेश्वरी कभी इस परिवार में भी पूजित थीं। वर्ष 1994 में उस प्रतिमा के चोरी हो जाने के बाद नई भुवनेश्वरी प्रतिमा की स्थापना की गई।
अष्टमी को परंपरा के अनुसार कुमारी पूजा होती है। नवमी और दशमी के अनुष्ठानों में भी पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। देवी को शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है। हालांकि, दशमी का पांता भात इस पूजा की सबसे अलग परंपराओं में शामिल है। नवमी की रात मिट्टी के बर्तन में चावल पकाकर पानी में रखा जाता है। अगले दिन उसी चावल का पांता भात बनाकर देवी को भोग लगाया जाता है। बाद में केला, दही, कसुंदी समेत अन्य सामग्री के साथ प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है।
समय के साथ पूजा की कुछ पुरानी प्रथाओं में बदलाव भी आया है। परिवार के सदस्य दीपक सेन शर्मा के अनुसार, पहले यहां पशुबलि की परंपरा थी। सप्तमी को सात, अष्टमी को आठ, संधि पूजा में एक और नवमी को नौ पशुओं की बलि दी जाती थी। बाद में परिवार के सदस्यों ने आपसी चर्चा के बाद इस प्रथा को समाप्त कर दिया। आज न जमींदारी व्यवस्था है और न ही हवेली में पहले जैसी चहल-पहल। इसके बावजूद दुर्गापूजा के दौरान परिवार के सदस्य एक साथ जुटते हैं और पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। बदलते समय के बीच 17 फुट का एकचाला ढांचा, गृहदेवी भुवनेश्वरी और दशमी के पांता भात जैसी परंपराएं कालिगंज की ‘बाबू बाड़ी’ की दुर्गापूजा को क्षेत्र के सामाजिक और पारिवारिक इतिहास से जोड़कर रखती हैं।




